अलंकार किसे कहते हैं ?




आप जानते हैं अलंकार किसे कहते हैं ? तो आज हम आपको ” अलंकार किसे कहते हैं ” के बारे मैं जानकारी देने बाले हैं। जिससे आपको अलंकार किसे कहते हैं पता चलेगा। तो आइये जानते हैं “ अलंकार किसे कहते हैं”

अलंकार :

‘ अलंकार शब्द ‘ अलम् ‘ एवं ‘ कार ‘ के योग से बना है , जिसका अर्थ है – आभूषण या विभूषित करनेवाला । जिन उपकरणों या शैलियों से काव्यों की सुन्दरता बढ़ाई जाती है , उन्हें ही अलंकार ‘ कहा जाता है ।

अलंकार मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं –

  • शब्दालंकार
  • अर्थालंकार

शब्दालंकार किसे कहा हैं ? इसके अंतर्गत क्या क्या अलंकार आते हैं ?

जहाँ शब्दों में अलंकार हो । अलंकार में शब्द विशेष को बदल दिया जाय तो अलंकार नहीं रह पाएगा । इसके अंतर्गत अनुप्रास , यमक , श्लेष , पुनरुक्ति प्रकाश , प्रश्न , स्वरमैत्री आदि अलंकार आते हैं ।

1. अनुप्रास अलंकार :

इस अलंकार में किसी व्यंजन वर्ण की आवृत्ति होती है । आवृत्ति का अर्थ है दुहराना । जैसे — ‘ तरनि तनूजा तट तमाल तरूवर बहु छाये । ” उपर्युक्त उदाहरणों में ‘ त ‘ वर्ण की लगातार आवृत्ति है , इस कारण से इसमें अनुप्रास अलंकार की छटा है ।

अनुप्रास के अन्य उदाहरण :

  1. प्रसाद के काव्य – कानन की काकली कहकहे लगाती नजर आती है ।
  2. चारु चंद्र की चंचल किरणें , खेल रही हैं जल – थल में ।
  3. मुदित महीपति मंदिर आए । सेवक सचिव सुमंत बुलाए ।
  4. बंदऊँ गुरुपद पदुम परागा । सुरुचि सुवास सरस अनुरागा ।
  5. सेस महेस दिनेस सुरेसहु जाहि निरंतर गावै ।
  6. प्रतिभट कटक कटीले केते काटि – काटि कालिका – सी किलकि कलेऊ देत काल को ।
  7. विमलवाणी ने वीणा ली कमल कोमल कर में सप्रीत ।
  8. लाली मेरे लाल की जित देखौं तित लाल । लाली देखन मैं गई मैं भी हो गई लाल ।।
  9. संसार की समर स्थली में धीरता धारण करो ।

2. यमक अलंकार :

जिस काव्य में समान शब्द के अलग अलग अर्थों में आवृत्ति हो , वहाँ यमक अलंकार होता है । यानी जहाँ एक ही शब्द जितनी बार आए उतने ही अलग – अलग अर्थ दे । जैसे —

कनक कनक ते सौगुनी मादकता अधिकाय ।

या खाए बौरात नर या पाए बौराय ।।

इस पद्य में ‘ कनक ‘ शब्द का प्रयोग दो बार हुआ है । प्रथम कनक का अर्थ ‘ सोना ‘ और दूसरे कनक का अर्थ धतूरा है । अत : कनक शब्द का दो बार प्रयोग और भिन्नार्थ के कारण उक्त पंक्तियों में यमक अलंकार की छटा दिखती है ।

3. श्लेष अलकार :

‘ श्लेष का अर्थ – चिपकना । जिस शब्द में एकाधिक अर्थ हो , उसे ही श्लिष्ट शब्द कहते हैं । श्लेष के दो भेद होते हैं – शब्द श्लेष और अर्थ श्लेष

( a ) शब्द श्लेष : जहाँ एक शब्द अनेक अर्थों में प्रयुक्त होता है , वहाँ शब्द श्लेष होता है । जैसे –

रहिमन पानी राखिए , बिन पानी सब सून ।

पानी गए न ऊबरे , मोती , मानुस . चून ।।

यहाँ दूसरी पंक्ति में ‘ पानी ‘ श्लिष्ट शब्द है , जो प्रसंग के अनुसार तीन अर्थ दे रहा है –

मोती के अर्थ में – चमक

मनुष्य के अर्थ में – प्रतिष्ठा और

चूने के अर्थ में – जल

इस एक शब्द के द्वारा अनेक अर्थों का बोध कराए जाने के कारण यहाँ श्लेष अलकार है ।

( b ) अर्थ श्लेष : जहाँ सामान्यतः एकार्थक शब्द के द्वारा एक से अधिक अर्थों का बोध हो , उसे अर्थ – श्लेष कहते हैं । जैसे –

नर की अरु नलनीर की गति एकै कर जोय ।

जेतो नीचो हदै चले , तेतो ऊँचो हो ।

उक्त उदाहरण की दूसरी पंक्ति में नीची हवै चले ‘ और ऊँचो होय ‘ शब्द सामान्यतः एक ही अर्थ का बोध कराते हैं , लेकिन ‘ नर ‘ और ‘ नलनीर ‘ के प्रसंग में दो भिन्नार्थों की प्रतीति कराते हैं ।

4. वीप्सा अलंगकार :

आदर , घबराहट , आश्चर्य , घृणा , रोचकता आदि प्रदर्शित करने के लिए किसी शब्द को दुहराना ही वीप्सा अलंकार है । जैसे-

मधुर – मधुर मेरे दीपक जल ।

वीप्सा अलंकार को ही ‘ पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार ‘ कहा जाता है ।

5. प्रश्न अलंकार :

यदि पद में प्रश्न किया जाय तो उसमें प्रश्न अलंकार होता है । जैसे –

जीवन क्या है ? निर्झर है ।

मस्ती ही इसका पानी है ।

अर्थालंकार किसे कहा हैं ? इसके अंतर्गत क्या क्या अलंकार आते हैं ?

जहाँ अलंकार अर्थ पर आश्रित हो , वहाँ अर्थालंकार होता है । इस अलंकार में शब्दों के परिवर्तन कर देने पर भी अर्थ में बदलाव नहीं आता है । इस अलंकार के अंतर्गत उपमा , रूपक , उत्प्रेक्षा , अतिशयोक्ति , अन्योक्ति , अपहनुति , व्यतिरेक , विरोधाभास आदि आते हैं ।

1. उपमा अलंकार :

‘ उप ‘ का अर्थ है – ‘ समीप से ‘ और ‘ मा ‘ का तौलना या देखना । ‘ उपमा ‘ का अर्थ है — एक वस्तु दूसरी वस्तु को रखकर समानता दिखाना । अतः ; जब दो भिन्न वस्तुओं में समान धर्म के कारण समानता दिखाई जाती है , तब वहाँ उपमा अलंकार होता है ।

साधारणतया , उपमा के चार अंग होते हैं-

( a ) उपमेय : जिसकी उपमा दी जाय , अर्थात् जिसकी समता किसी दूसरे पदार्थ से दिखलाई जाय । जैसे-

कर कमल सा कोमल है । इस उदाहरण में ‘ कर ‘ उपमेय है ।

( b ) उपमान : जिससे उपमा दी जाय , अर्थात् उपमेय को जिसके समान बताया जाय । उक्त उदाहरण में ‘ कमल ‘ उपमान है ।

( c ) साधारण धर्म : ‘ धर्म ‘ का अर्थ है ‘ प्रकृति ‘ या ‘ गुण ‘ । उपमेय और उपमान में विद्यमान समान गुण को ही साधारण धर्म कहा जाता है । उक्त उदाहरण में ‘ कमल ‘ और ‘ कर ‘ दोनों के समान धर्म हैं – कोमलता ।

( d ) वाचक : उपमेय और उपमान के बीच की समानता बताने के लिए जिन वाचक शब्दों का प्रयोग होता है , उन्हें ही वाचक कहा जाता है । उपर्युक्त उदाहरण में ‘ सा ‘ वाचक है ।

नोट : जहाँ उपमा के चारों अंग उपस्थित हों वहाँ ‘ पूर्णोपमा ‘ और जहाँ एक या एकाधिक अंग लुप्त हों वहाँ लुप्तोपमा होती है ।

पूर्णोपमा का उदाहरण :

पीपर पात सरिस मन डोला ।

  • यहाँ , मन – उपमेय
  • पीपर पात – उपमान
  • सरिस – वाचक
  • डोला – साधारण धर्म

लुप्तोपमा का उदाहरण :

यह देखिए , अरविन्द – से शिशु वृन्द कैसे सो रहे ।

  • यहाँ शिशुवृन्द – उपमेय
  • अरविन्द – उपमान
  • से – वाचक
  • लुप्त है – साधारण धर्म

2. रूपक अलंकार :

जब उपमेय पर उपमान का निषेध रहित आरोप करते हैं , तब रूपक अलंकार होता है । उपमेय में उपमान के आरोप का अर्थ है — दोनों में अभिन्नता या अभेद दिखाना । इस आरोप में निषेध नहीं होता है । जैसे –

” यह जीवन क्या है ? निर्झर है ।

” इस उदाहरण में जीवन को निर्झर के समान न बताकर जीवन को ही निर्झर कहा गया है । अतएव , यहाँ रूपक अलंकार हुआ ।

दूसरा उदाहरण – बीती विभावरी जागरी !

अम्बर – पनघट में डुबो रही

तारा – घट ऊषा नागरी ।

यहाँ , ऊषा में नागरी का , अम्बर में पनघट का और तारा में घट का निषेध रहित आरोप हुआ है । अतः , यहाँ रूपक अलंकार है ।

3.. उतीक्षा अलंकार :

जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना का वर्णन हो , वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है । उत्प्रेक्षा के वाचक पद ( लक्षण ) : यदि पंक्ति में ज्यों , मानो , जानो , इव , मनु , जनु , जान पड़ता है – इत्यादि हो तो मानना चाहिए कि वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग हुआ है । जैसे –

सखि ! सोहत गोपाल के उर गुंजन की माल ।

बाहर लसत मनो पिए दावानल की ज्वाल ।।

यहाँ उपमेय ‘ गुंजन की माल में उपमान ज्वाला ‘ की संभावना प्रकट की गई है ।

4. अतिशयोक्ति अलंकार :

जहाँ किसी बात का वर्णन काफी बढ़ा – चढ़ाकर किया जाय , वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है ।

जैसे — आगे नदिया पड़ी अपार , घोड़ा कैसे उतरे पार ।

राणा ने सोचा इस पार , तब तक चेतक था उस पार ।।

इन पंक्तियों में चेतक की शक्ति और स्फूर्ति को काफी बढ़ा – चढ़ाकर बताया गया है ।

5. अन्योक्ति अलंकार :

जहाँ उपमान के वर्णन के माध्यम से उपमेय का वर्णन हो , वहाँ अन्योक्ति अलंकार होता है । इस अलंकार में कोई बात सीधे – सादे रूप में न कहकर किसी के माध्यम से कही जाती है । जैसे –

नहिं पराग नहिं मधुर मधु , नहिं विकास इहिकाल ।

अली कली ही सौं बंध्यो , आगे कौन हवाल ।।

यहाँ उपमान ‘ कली ‘ और ‘ भौरे ‘ के वर्णन के बहाने उपमेय ( राजा जय सिंह और उनकी नवोढ़ा नायिका ) की ओर संकेत किया गया है ।

6. अपहनुति अलंकार :

उपमेय पर उपमान का निषेध – रहित आरोप अपहनुति अलंकार है । इस अलंकार में न , नहीं आदि निषेधवाचक अव्ययों की सहायता से उपमेय का निषेध कर उसमें उपमान का आरोप करते हैं । जैसे –

बरजत हूँ बहुबार हरि , दियो चीर यह चीर ।

का मनमोहन को कहै , नहिं बानर बेपीर ।

यहाँ कृष्ण द्वारा वस्त्र फाड़े जाने को बन्दर द्वारा फाड़ा जाना कहा गया है ।

7. व्यतिरेक अलंकार :

इस अलंकार में उपमान की अपेक्षा उपमेय को काफी बढ़ा – चढ़ाकर वर्णन किया जाता है । जैसे-

जिनके जस प्रताप के आगे । ससि मलिन रवि सीतल लागे ।

यहाँ उपमेय ‘ यश ‘ और ‘ प्रताप ‘ को उपमान ‘ शशि ‘ एवं ‘ सूर्य ‘ से भी उत्कृष्ट कहा गहा है ।

8. सन्देह अलंकार :

उपमेय में जब उपमान का संशय हो तब संदेह अलंकार होता है । जैसे –

कहूँ मानवी यदि मैं तुमको तो ऐसा संकोच कहाँ ?

कहूँ दानवी तो उसमें है यह लावण्य की लोच कहाँ ?

वन देवी समझू तो वह तो होती है भोली भाली ।

तुम्हीं बताओ अतः कौन हो तुम हे रंजित रहस्य वाली ? ( लक्ष्मण ने जब शूर्पणखा को देखा तो उन्हें मानवी , दानवी और वन देवी का संदेह हुआ ) ।

9. विरोधामास अलंकार :

जहाँ बाहर से तो विरोध जान पड़े , किन्तु यथार्थ में विरोध न जैसे –

( a ) जब से है आँख लगी तबसे न आँख लगी ।

( b ) यह अथाह पानी रखता है यह सूखा – सा गात्र ।

( c ) प्रियतम को समक्ष पा कामिनी न जा सकी न ठहर सकी ।

( d ) आई ऐसी अद्भुत बेला ना रो सका न विहँस सका ।

( e ) ना खुदा ही मिला ना बिसाले सनम ना इधर के रहे ना उधर के रहे ।

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