क्रिया किसे कहते हैं ?




आप जानते हैं क्रिया किसे कहते हैं ? तो आज हम आपको ” क्रिया किसे कहते हैं ” के बारे मैं जानकारी देने बाले हैं। जिससे आपको क्रिया किसे कहते हैं पता चलेगा। तो आइये जानते हैं “क्रिया किसे कहते हैं”

*क्रिया किसे कहते हैं ?

क्रिया वाक्य को पूर्ण बनाती है । इसे ही वाक्य का ‘ विधेय ‘ कहा जाता है । वाक्य में किसी काम के करने या होने का भाव क्रिया ही बताती है । अतएव , ‘ जिससे काम का होना या करना समझा जाय , उसे ही ‘ क्रिया ‘ कहते हैं । जैसे –

लड़का मन से पढ़ता है और परीक्षा पास करता है ।

उक्त वाक्य में पढ़ता है ‘ और ‘ पास करता है ‘ क्रियापद हैं ।

*क्रियार्थक संज्ञा किसे कहते हैं ?

1. क्रिया का सामान्य रूप ‘ ना ‘ अन्तवाला होता है । यानी क्रिया के सामान्य रूप में ‘ ना ‘ लगा रहता है । जैसे –

  • खाना : खा
  • पढ़ना : पढ़
  • सुनना : सुन
  • लिखना : लिख आदि ।

नोट : यदि किसी काम या व्यापार का बोध न हो तो ‘ ना ‘ अन्तवाले शब्द क्रिया नहीं कहला सकते । जैसे –

सोना महँगा है । ( एक धातु है )

वह व्यक्ति एक आँख से काना है । ( विशेषण )

उसका दाना बड़ा ही पुष्ट है । ( संज्ञा )

2. क्रिया का साधारण रूप क्रियार्थक संज्ञा का काम भी करता है । जैसे –

सुबह का टहलना बड़ा ही अच्छा होता है ।

इस वाक्य में ‘ टहलना ‘ क्रिया नहीं है ।

*मुख्यतः क्रिया के कितने प्रकार होते हैं ?

मुख्यतः क्रिया के दो प्रकार होते हैं

1. सकर्मक क्रिया :

” जिस क्रिया का फल कर्ता पर न पड़कर कर्म पर पड़े , उसे सकर्मक क्रिया ‘ ( Transitive verb ) कहते हैं । ”

अतएव , यह आवश्यक है कि वाक्य की क्रिया अपने साथ कर्म लाये । यदि क्रिया अपने साथ कर्म नहीं लाती है तो वह अकर्मक ही कहलाएगी । नीचे लिखे वाक्यों को देखें :

  1. प्रवर अनू पढ़ता है । ( कर्म – विहीन क्रिया )
  2. प्रवर अनू पुस्तक पढ़ता है । ( कर्मयुक्त क्रिया )

प्रथम और द्वितीय दोनों वाक्यों में पढ़ना ‘ क्रिया का प्रयोग हुआ है ; परन्तु प्रथम वाक्य की क्रिया अपने साथ कर्म न लाने के कारण अकर्मक हुई , जबकि द्वितीय वाक्य की वही क्रिया अपने साथ कर्म लाने के कारण सकर्मक हुई ।

2. अकर्मक क्रिया :

” वह किया , जो अपने साथ कर्म नहीं लाये अर्थात् जिस क्रिया का फल या व्यापार कर्ता पर ही पड़े , वह अकर्मक क्रिया ( Intransitive Verb ) कहलाती है । जैसे –

उल्लू दिनभर सोता है ।

इस वाक्य में ‘ सोना ‘ क्रिया का व्यापार उल्लू ( जो कर्ता है ) ही करता है और वही सोता भी है । इसलिए ‘ सोना ‘ क्रिया अकर्मक हुई ।

कुछ क्रियाएँ अकर्मक सकर्मक दोनों होती हैं । नीचे लिखे उदाहरणों को देखें:

  1. उसका सिर खुजलाता है । ( अकर्मक )
  2. वह अपना सिर खुजलाता है । ( सकर्मक )
  3. जी घबराता है । ( अकर्मक )
  4. विपत्ति मुझे घबराती है । ( सकर्मक )
  5. बूँद – बूँद से तालाब भरता है । ( अकर्मक )
  6. उसने आँखें भर के कहा ( सकर्मक )
  7. गिलास भरा है । ( अकर्मक )
  8. हमने गिलास भरा है । ( सकर्मक )

*अकर्मक क्रिया कब सकर्मक बन जाती है ?

जब कोई अकर्मक क्रिया अपने ही धातु से बना हुआ या उससे मिलता – जुलता सजातीय कर्म चाहती है तब वह सकर्मक कहलाती है । जैसे –

सिपाही रोज एक लम्बी दौड़ दौड़ता है ।

भारतीय सेना अच्छी लड़ाई लड़ना जानती है | लड़ती है ।

यदि कर्म की विवक्षा न रहे , यानी क्रिया का केवल कार्य ही प्रकट हो , तो सकर्मक क्रिया भी अकर्मक – सी हो जाती है । जैसे-

ईश्वर की कृपा से बहरा सुनता है और अंधा देखता है ।

एक प्रेरणार्थक क्रिया होती है , जो सदैव सकर्मक ही होती है । जब धातु में आना , वाना , इसके दो रूप होते हैं : लाना या लवाना , जोड़ा जाता है तब वह धातु ‘ प्रेरणार्थक क्रिया ‘ का रूप धारण कर लेता है ।इसके दो रूप हैं :

धातुप्रथम प्रेरणार्थक द्वितीय प्रेरणार्थक
हँसहँसाना हँसवाना
जी जिलाना जिलवाना
सुन सुनाना सुनवाना
धो धुलाना धुलवाना

शेष में आप आना , वाना , लाना , लवाना , जोड़कर प्रेरणार्थक रूप बनाएँ :

कह पढ़ जल मल भर गल सोच बन देख निकल रह पी रट छोड़

  • जा – भेजना – भिजवाना
  • टूट – तोड़ना – तुड़वाना

अर्थात् जब किसी क्रिया को कर्ता कारक स्वयं नहीं करके किसी अन्य को करने के लिए प्रेरित करे तब वह क्रिया प्रेरणार्थक क्रिया ‘ कहलाती है ।

प्रेरणार्थक रूप अकर्मक एवं सकर्मक दोनों प्रकार की क्रियाओं से बनाया जाता है । प्रेरणार्थक क्रिया बन जाने पर अकर्मक क्रिया भी सकर्मक रूप धारण कर लेती है ।

अकर्मक से सकर्मक बनाने के नियम :

1 . दो अक्षरों के धातु के प्रथम अक्षर को और तीन अक्षरों के धातु के द्वितीयाक्षर को दीर्घ करने से अकर्मक धातु सकर्मक हो जाता है । जैसे –

अकर्मक सकर्मक
लदनालादना
फंसना फाँसना
गड़ना गाड़ना
लुटना लूटना

2. यदि अकर्मक धातु के प्रथमाक्षर में ‘ इ ‘ या ‘ उ ‘ स्वर रहे तो इसे गुण करके सकर्मक धातु बनाए जाते हैं । जैसे-

घिरना घेरना
फिरना फेरना
छिदना छेदना
मुड़ना माड़ना

3 . ट ‘ अन्तवाले अकर्मक धातु के ‘ ट ‘ को ‘ ड ‘ में बदलकर पहले या दूसरे नियम से सकर्मक धातु बनाते हैं । जैसे –

जुटना जोड़ना
छूटना छोड़ना.
टूटना तोड़ना

*पूर्वकालिक और संयुक्त क्रिया किसे कहते हैं ? संयुक्त क्रिया कितने प्रकार होते हैं ?

क्रिया अन्य कई प्रकार का हैं :

पूर्वकालिक क्रिया :

” जब कोई कर्ता एक क्रिया समाप्त करके दूसरी क्रिया करता है तब पहली क्रिया पूर्वकालिक क्रिया ‘ कहलाती है । जैसे –

  • चोर उठ भागा । ( पहले उठना फिर भागना )
  • वह खाकर सोता है । ( पहले खाना फिर सोना )

उक्त दोनों वाक्यों में ‘ उठ ‘ और ‘ खाकर ‘ पूर्वकालिक क्रिया हुई ।

पूर्वकालिक क्रिया प्रयोग में अकेली नहीं आती है , वह दूसरी क्रिया के साथ ही आती है । इसके चिह्न हैं –

  • धातु +0 – उठ , जाना …..
  • धातु + के – उठके , जाग के…..
  • धातु + कर – उठकर , जागकर …..
  • धातु + करके – उठकरके , जागकरके …..

नोट : परन्तु , यदि दोनों साथ – साथ हों तो ऐसी स्थिति में वह पूर्वकालिक न होकर क्रियाविशेषण का काम करता है । जैसे — वह बैठकर पढ़ता है ।

इस वाक्य में ‘ बैठना ‘ और ‘ पढ़ना ‘ दोनों साथ – साथ हो रहे हैं । इसलिए ‘ बैठकर ‘ क्रिया विशेषण है । इसी तरह निम्नलिखित वाक्यों में रेखांकित पदों पर विचार करें-

  • ( a ) बच्चा दौड़ते – दौड़ते थक गया । ( क्रियाविशेषण )
  • ( b ) खाया मुँह नहाया बदन नहीं छिपता । ( विशेषण )
  • ( c ) बैठे – बैठे मन नहीं लगता है । ( क्रियाविशेषण )

2. संयुक्त क्रिया

” जो क्रिया दो या दो से अधिक धातुओं के योग से बनकर नया अर्थ देती है यानी किसी एक ही क्रिया का काम करती है , वह संयुक्त क्रिया कहलाती है । जैसे –

  • उसने खा लिया है । ( खा + लेना )
  • तुमने उसे दे दिया था । ( दे + देना )

अर्थ के विचार से संयुक्त क्रिया के कई प्रकार होते हैं :

1. निश्चयबोधक : धातु के आगे उठना , बैठना , आना , जाना , पड़ना , डालना , लेना , देना , चलना और रहना के लगने से निश्चयबोधक संयुक्त क्रिया का निर्माण होता है । जैसे –

  • वह एकाएक बोल उठा
  • वह देखते ही देखते उसे मार बैठा
  • मैं उसे कब का कह आया हूँ ।
  • दाल में घी डाल देना
  • खेलते खेलते गिर पड़ा

2. शक्तिबोधक : धातु के आगे ‘ सकना ‘ मिलाने से शक्तिबोधक क्रियाएँ बनती हैं । जैसे –

दादाजी अब चल फिर सकते हैं ।

वह रोगी अब उठ सकता है ।

कर्ण अपना सब कुछ दे सकता है ।

3. समाप्तिबोधक : जब धातु के आगे ‘ चुकना ‘ रखा जाता है , तब वह क्रिया समाप्तिबोधक हो जाती है । जैसे –

मैं आपसे कह चुका हूँ ।

वह भी यह दृश्य देख चुका है ।

4. नित्यताबोधक : सामान्य भूतकाल की क्रिया के आगे करना ‘ जोड़ने से नित्यताबोधक क्रिया बनती है । जैसे –

तुम रोज यहाँ आया करना ।

तुम रोज चैनल देखा करना ।

5. तत्कालबोधक : सकर्मक क्रियाओं के सामान्य भूतकालिक पुं ० एकवचन रूप के अंतिम स्वर ‘ आ ‘ को ‘ ए ‘ करके आगे ‘ डालना ‘ या ‘ देना ‘ लगाने से तत्कालबोधक क्रियाएँ बनती हैं । जैसे –

कहे डालना , कहे देना , दिए डालना आदि ।

6. इच्छाबोधक : सामान्य भूतकालिक क्रियाओं के आगे ‘ चाहना ‘ लगाने से इच्छाबोधक क्रियाएँ बनती हैं । इनसे तत्काल व्यापार का बोध होता है । जैसे –

लिखा चाहना , पढ़ा चाहना , गया चाहना आदि ।

7.आरंभबोधक : क्रिया के साधारण रूप ‘ ना ‘ को ‘ ने ‘ करके लगना मिलाने से आरंभ बोधक क्रिया बनती है । जैसे –

आशु अब पढ़ने लगी है ।

मेघ बरसने लगा ।

8. अवकाशवोधक : क्रिया के सामान्य रूप के ‘ ना ‘ को ‘ ने ‘ करके ‘ पाना ‘ या ‘ देना ‘ मिलाने से अवकाश बोधक क्रियाएँ बनती हैं । जैसे-

अब उसे जाने भी दो ।

देखो , वह जाने न पाए ।

आखिर तुमने उसे बोलने दिया ।

9.परतंत्रताबोधक : क्रिया के सामान्य रूप के आगे ‘ पड़ना ‘ लगाने से परतंत्रताबोधक क्रिया बनती है । जैसे-

उसे पाण्डेयजी की आत्मकथा लिखनी पड़ी ।

आखिरकार बच्चन जी को भी यहाँ आना पड़ा ।

10 . एकार्थकबोधक : कुछ संयुक्त क्रियाएँ एकार्थबोधक होती हैं । जैसे –

वह अब खूब बोलता चालता है ।

वह फिर से चलने – फिरने लगा है ।

*नामधातु किसे कहते हैं ?

” क्रिया को छोड़कर दूसरे शब्दों से ( संज्ञा , सर्वनाम एवं विशेषण ) से जो धातु बनते हैं , उन्हें ‘ नामधातु ‘ कहते हैं । जैसे-

पुलिस चोर को लतियाते थाने ले गई ।

वे दोनों बतियाते चले जा रहे थे ।

मेहमान के लिए जरा चाय गरमा देना ।

नामधातु बनाने के नियम :

1. कई शब्दों में ‘ आ ‘ कई में ‘ या ‘ और कई में ‘ ला ‘ के लगने से नामधातु बनते हैं । जैसे-

मेरी बहन मुझसे ही लजाती है । ( लाज – लजाना )

तुमने मेरी बात झुठला दी है । ( झूठ – झूठलाना )

जरा पंखे की हवा में ठंडा लो , तब कुछ कहना । ( ठंडा – ठंडाना )

2. कई शब्दों में शून्य प्रत्यय लगाने से नामधातु बनते हैं । जैसे –

  • रंग : रँगना
  • गाँठ : गाँठना
  • चिकना : चिकनाना आदि ।

3. कुछ अनियमित होते हैं । जैसे –

  • दाल : दलना ,
  • चीथड़ा : चिथेड़ना आदि ।

4. ध्वनि विशेष के अनुकरण से भी नामधातु बनते हैं । जैसे –

  • भनभन : भनभनाना
  • टर्र : टरटराना / टरांना

* क्रियाओं के प्रकारकृत कितने भेद हैं ?

क्रियाओं के प्रकारकृत तीन भेद होते हैं :

1. साधारण क्रिया : वह क्रिया , जो सामान्य अवस्था की हो और जिसमें संभावना अथवा आज्ञा का भाव नहीं हो । जैसे-

मैंने देखा था । उसने क्या कहा ?

2. संभाव्य क्रिया : जिस क्रिया में संभावना अर्थात् अनिश्चय , इच्छा अथवा संशय पाया जाय । जैसे-

यदि हम गाते थे तो आप क्यों नहीं रुक गए ?

यदि धन रहे तो सभी लोग पढ़ – लिख जाएँ ।

मैंने देखा होगा तो सिर्फ आपको ही ।

नोट : हेतुहेतुमद् भूत , संभाव्य भविष्य एवं संदिग्ध क्रियाएँ इसी श्रेणी में आती है ।

3. आज्ञार्थक क्रिया या विधिवाचक क्रिया : इससे आज्ञा , उपदेश और प्रार्थनासूचक क्रियाओं का बोध होता है । जैसे –

तुम यहाँ से निकलो ।

गरीबों की मदद करो ।

कृपा करके मेरे पत्र का उत्तर अवश्य दीजिए ।

Leave a Reply