शब्द परिवार किसे कहते हैं ?




आप जानते हैं शब्द परिवार किसे कहते हैं ? तो आज हम आपको ” शब्द परिवार किसे कहते हैं ” के बारे मैं जानकारी देने बाले हैं। जिससे आपको शब्द परिवार किसे कहते हैं ? पता चलेगा। तो आइये जानते हैं “शब्द परिवार किसे कहते हैं ?”

शब्द परिवार :

शब्द परिवार शब्दों का भी अपना परिवार होता है । यह परिवार दो तरह का होता है –

A. विभिन्न भाषाओं में एकरूपता के कारण उन शब्दों को पारिवारिक शब्द माना गया है नीचे कुछ उदाहरणों के द्वारा हम इसपर चर्चा करेंगे :

1. माता – मा – मम्मी – मदर :

‘ माता ‘ शब्द भारोपीय परिवार का एक प्राचीनतम शब्द है , जिसका प्रयोग आर्य जाति बहुत पहले से कर रही थी । इसी कारण इसे-

ग्रीक में meter
लैटिन में mater
लिथुवानियन में mote
संस्कृतमातृ
आइसलैंडिकmodir
अंग्रेजीmother
जर्मन में muotar / mutter
स्लाव में mati

2. पिता – पितु – पितृ – फादर :

यह भी अत्यन्त पुराना शब्द है । इसका संबंध पा ‘ धातु , जिसका अर्थ है — पालन से माना जाता है । इसका आधार अनुकरणमूलक शब्द ‘ पा ‘ से है । वस्तुतः छोटे बच्चे आरंभ में पा , मा , आदि ओष्ठ्य ध्वनियों का उच्चारण करते हैं । इसे विभिन्न भाषाओं में भिन्न – भिन्न नामों से संबोधित किया जाता है । जैसे-

अवेस्ता पिता
लैटिनpater
गौथिकfadar
ग्रीक patter
जर्मन vater
अंग्रजी father
संस्कृतपितृ

3.पुत्र बेटा – सुत – सन – सूनु – स्नुषा :

‘ पुत्र ‘ शब्द की व्युत्पत्ति गोपथ ब्राह्मण , निरूक्त , रामायण महाभारत , मनुस्मृति , कठोपनिषद् आदि में मिलती है । एक मत के अनुसार इसकी रचना ‘ पुत् ‘ से मानी गई है । कठोपनिषद् में कहा गया है : “ पुं नरकात् त्रायते इति पुत्रः । ” अर्थात् ‘ पुत् ‘ नामक नरक से तारनेवाले को ही पुत्र कहा गया है । इसकी व्युत्पत्ति है : पुत् + त्र / इस आधार पर ‘ पुत्र ‘ को ‘ पुत्र ‘ लिखना चाहिए , लेकिन प्रचलन में ‘ पुत्र ही लिखा जाता है । पुत्रार्थी संस्कृत शब्द ‘ सूनु ‘ अपेक्षाकृत अति प्राचीन है । इसका संबंध ‘ सू ‘ ( पैदा होना ) धातु से माना जाता है । अर्थात् ‘ सूनु ‘ वह है , जो पैदा हो । इसे –

अंग्रेजी मेंson
जर्मन मेंsohn
अवेस्ता में hunu
लिथुवानियनsunus
डच में zoon
ऐंग्ला – सैक्सन में sunu
नार्स मेंsunu

वैदिक साहित्य में ‘ स्नुषा ‘ ( पतोहू ) का संबंध भी ‘ सूनु ‘ से ही माना जाता है । इस स्नुमा का रूप भी विभिन्न भाषाओं में इस प्रकार मिलता है –

पंजाबी में नू
ऐंग्लो सैक्सन में snoru
हिन्दी में पतोहू
लैटिन में snura
संस्कृत में पुत्रवधू
ग्रीक में nuos
स्लाव में snucha

4.दुहिता – दुघ्दर – दुख्तर – डाउटर – बेटी :

निरुक्त में ‘ दूरे हिता भवति ‘ कहकर निरुक्तकार ने इसे दूर रहने में हित की सिफारिश की है तो कुछ लोगों ने ‘ दुहिता ‘ का संबंध ‘ दह् ‘ ( जलाना ) से माना है । कुछ का कहना है कि यह शब्द ‘ दू ‘ ( दुखी करना ) से संबंधित है ; परन्तु प्राचीन भारोपीय परिवार में पुत्री का प्रमुख कार्य गायें दुहना था । इस प्रकार ‘ दुहिता ‘ का मूलार्थ हुआ— दूध दूहनेवाली । इसे—

अवेस्ता में दुघ्दर
जर्मन में tochter
लिथुवानियम में dukter
फारसी मेंदुख्तर
अंग्रेजी में daughter
स्लाव मेंdushti
ग्रीस में thygater
गोथिक में dauchter

5. भाई – ब्रदर – भ्राता :

इसका संबंध संस्कृत के ‘ भ्रातृ ‘ से माना गया है । एक दूसरे मत के अनुसार इसका संबंध ‘ भ्राज् ‘ ( चमकना ) से माना जाता है । यह भी विभिन्न भाषाओं में भिन्न – भिन्न नामों से पुकारा जाता है –

अंग्रेजी मेंbrother
लैंटिन में frater
ग्रीक में phrater
अवेस्ता में bratar
लिथुवानियमन में broterelis
संस्कृत मेंभ्राता
जर्मन में bruder
हिन्दी में भाई

इसी शब्द से भ्रातृज , भतीजा , भ्रातृजा , भतीजी , भावज , भ्रातृजाया , भौजाई , भौजी आदि सम्बद्ध हैं ।

इसी तरह कुछ अन्य शब्दों को विभिन्न भाषाओं में भिन्न – भिन्न नामों से पुकारा जाता है :

बहिन :

अंग्रेजी में sister
लिथुवानियन में sesu
आइसलैंड में systir
हिन्दी में बहिन / बहन
लैटिन में soror
डच में zuster
संस्कृत मेंभगिनी , स्वसा

इसी शब्द से बने अन्य शब्द हैं — बहनोई , भगिनीपति , भानजा , भागिनेय , भानजी , भाँजी , भागिनेयी आदि ।

ससुर :

संस्कृत में श्वसुर
लिथुवानियन में szeszuras
स्लाव मेंsvekru
ग्रीक में ekuros
गोथिक में swaihra
ऐंग्लोसैक्सन मेंsweor
लैटिन में socer
जर्मन मेंsweher

और इसी से बने शब्द सास , ससुराल , साला , साली आदि हैं ।

इस प्रकार हमने देखा कि व्युत्पत्ति या मूल शब्द के आधार पर दुनिया की बहुत सारी भाषाओं के शब्दों को एक परिवार के अन्तर्गत रखा गया है । इसका विस्तृत अध्ययन भाषा विज्ञान में किया जाता है ।

B. शब्द का दूसरा परिवार है- एक ही शब्द में विभिन्न उपसर्गों – प्रत्ययों को जोड़कर बनाए गए शब्द , जिनमें मूल रूप से वह शब्द ( मौलिक शब्द ) विद्यमान रहता है ।

उपर्युक्त सारे शब्द एक ही परिवार के सदस्य शब्द हुए । इसी तरह से निम्नलिखित शब्दों से चार – चार नये शब्द बनाएँ :

सत्य , वन , भारत , अर्थ , धन , धर्म , काम , जल , ग्राम , ज्ञान , चल , रथ , शहर , नगर , विज्ञान , जाति , विद्या , दल , पुस्तक , छल , मन , दिन , लोक , भोग , जहर , शिक्षा , संगठन , अंक , अंग , दया , अन्य , आत्मा , शिवा , शक्ति , वर्ष , गुण , कुल , आशा , जय , शोभा , उत्साह , कर्म , जीव , मूर्ख , कला , उदय , इतिहास , कृषि , मास , सेना , प्रार्थना , रंग , हर्ष , शरीर , शुद्ध , अश , चर , एक आदर , उत्तर , उपज , खुश , पुत्र , दोष , शान्त , निशा , दाम , भूमि , लहर , कष्ट , काल , घर , पति राष्ट , प्रान्त , खर्च , व्यय , अंशु , वर , अपराध ।

2.ध्वन्यात्मक शब्द

जब हम आदिम मानवों के काल का अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि भाषा के विकास , शब्दों के जन्म का उस समय की परिस्थितियों , प्राकृतिक घटनाओं , अन्य जीव – जन्तुओं से गहरा संबंध रहा है । न सिर्फ ध्वन्यात्मक शब्दों की उत्पत्ति का कारण रहा है वह आदिम – युग , बल्कि विभिन्न प्रकार की लिपियों यानी वर्गों के आकार प्रकार का श्रेय भी रहा है । हम विभिन्न वर्गों के आकारों और पेड़ – पौधों की टहनियों , उस समय के हथियारों , पशुओं के दाँतों , सींगों , पक्षियों की चोंचों , पैरों आदि में काफी कुछ समानता पाते हैं । उसी प्रकार विभिन्न ध्वनियों में हम प्राकृतिक घटनाओं की ध्वनियों , पशु पक्षियों की बोलियाँ आदि में काफी कुछ साम्य पाते हैं और उन ध्वनियों से बने बहुत सारे शब्दों का हम आज भी भाषा में प्रयोग करते हैं । नीचे कुछ ऐसी ही ध्वनियाँ दी जा रही हैं-

हाथीचिग्घाड़ना
भेड़भें – भे करना
बिल्लीम्याऊँ – म्याऊँ
सूअरकिकियाना
ऊँटबलबलाना
घोड़ाहिनहिनाना

3. प्रयोग के आधार पर शब्दों को तीन वर्गों में बाँटा गया है :

1.सामान्य शब्द : आम बोलचाल के शब्द , जो पारिभाषिक अर्थ में प्रयुक्त नहीं होते , सामान्य शब्द कहलाते हैं । जैसे , मकान , पानी , कहानी , पाठशाला , सड़क , नदी , झरना आदि |

इन शब्दों का अभिधेयार्थ प्रयोग होता है ।

2. अर्द्धपारिभाषिक शब्द : वैसे शब्द , जो कभी तो सामान्य अर्थ में प्रयुक्त और कभी पारिभाषिक रूप में प्रयुक्त होते हैं ।

उदाहरणस्वरूप : आप तो काफी माल मार रहे हैं ।

वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण बाजार में पड़े माल सड़ रहे हैं ।

वह आजकल तर माल उड़ा रहा है ।

उपर्युक्त तीनों वाक्यों में माल – शब्द का तीन अर्थों में प्रयोग हुआ है । प्रथम और तृतीय वाक्यों में प्रयुक्त ‘ माल ‘ शब्द सामान्य अर्थ : धन और स्वादिष्ट भोजन और द्वितीय वाक्य में प्रयुक्त माल अर्थशास्त्र का पारिभाषिक शब्द है जिसका अर्थ है : विनिमय – मूल्य और उपयोग मूल्य से युक्त ऐसी वस्तु या सेवा जो बिक्री हेतु बाजार में सक्रिय हो ।

इसी तरह मन , माया , कर्म , क्रिया , धातु , रस , मिश्रण , द्रव्य , भार , गति , चाल , घर्षण , संज्ञा आदि अर्द्ध पारिभाषिक शब्द के उदाहरण हैं ।

3. पारिभाषिक शब्द : वैसे शब्द , जो किसी पारिभाषिक शब्द के रूप में किसी विशिष्ट क्षेत्र या विषय में प्रयुक्त होते हैं । ऐसे शब्दों की एक सुनिश्चित परिभाषा होती है ।

उदाहरणस्वरूप : शिक्षा , मुद्रा , मुद्रास्फीति , अवमूल्यन , मांग , लाभांश , नौकरशाही , सामंत , स्थानांतरण , धर्मान्तरण , प्राधिकार , उत्क्रमित , लेखा – परीक्षा , इतिहास , भूगोल , विज्ञान आदि ।

4. शब्दों की कहानी : स्वयं की जुबानी नयी

घटनाओं , नये विचारों , नयी परम्पराओं , नयी वस्तुओं , इतिहास की करवटों के कारण हमारा जन्म होता है । 1965 ई ० में पाकिस्तानियों की घुसपैठ के कारण ‘ घुसपैठिया ‘ का जन्म हुआ । इसी तरह विभिन्न प्रलोभनों के चलते हमारे विधायकों , सांसदों ने अपने पाले बदल लिये । इस घटना से ‘ दलबदलू ‘ शब्द जनमा ।

हमारे जन्मों के कुछ आधार हैं , जैसे –

ध्वनि के कारण हमारा जन्म :

कोयल की कूक या कोक के कारण ‘ कोकिल ‘ तो मोटरसाइकिल के फट फट के कारण ‘ फटफटिया ‘ बना । इसी तरह भड़भड़ाना , खटखटाना , ठकठकाना , कड़कना , मिमियाना , मूंकना , हिनहिनाना जैसे क्रियात्मक शब्दों का जन्म हुआ । लोमड़ी की आवाज ‘ खै खै ‘ होती है जिससे मोजपुरियों ने उसे ‘ बखर ‘ और अन्य ने ‘ खिखिर ‘ कह डाला । ती ती की आवाज सुन लोगों ने ‘ लीतर ‘ का गठन किया तो ‘ झर झर ‘ की ध्वनि से निर्झर ।

नामों के कारण हमारा जन्म :

विभिन्न नाम भी हमें जन्म लेने में सहायता करते हैं । कहीं कहीं तो हम नाम से प्रभावित हो किसी खास व्यक्ति या उसके चरित्र के लिए रूढ़ हो जाते हैं । ‘ नारद ‘ इसी तरह का एक शब्द है जो इधर – उधर लगानेवाले ( चुगलखोर ) के लिए रूढ़ हो गया है । आज भी लोग कहते हैं — उस नारद से सावधान रहना । इसी तरह

नादिरशाह से नादिरशाही
हिटलर से हिटलरशाही / हिटलरी
गाँधी से गाँधीवाद / गाँधीवादी , गाँधीगिरी
भगीरथ से भगीरथ प्रयत्न , भागीरथी
राम सेरामबाण , रामराज्य
बनारस सेबनारसी , बनारसी साड़ी , बनारसी ठग , बनारसी जर्दा , बनारसी पान

हम भावात्मक रूप से विभिन्न परिस्थितियों , चरित्रों के बोधक बन जाते हैं-

रावण / कंस अत्याचारियों के लिए
सीता / सावित्री पतिव्रताओं के लिए
भीम / रूस्तमबलिष्ठ लोगों के लिए
युधिष्टिर / हरिश्चन्द्र अव्वल दर्जे के सत्यवादियों के लिए
भरत / लक्ष्मण आदर्श अनुजों के लिए
तिलोत्तमा / रति सुन्दर नारियों के लिए

नोट : साहित्यकार उपर्युक्त शब्दों का बिम्बों के लिए ( प्रतीकों के लिए ) प्रयोग करते हैं ।

स्थानों के नामों से भी हम बनते रहे हैं :

सूरत से बने सुरती / सुर्ती ( तम्बाकू के लिए )

चीन से बने चीनी ( शक्कर के लिए )

मिश्र से बने मिश्री

एकेदमी से बने अकादमी / एकेडेमी ( विद्यालयों के लिए )

संक्षेप के आधार पर हम बनते हैं :

शब्दों के संक्षिप्त रूप प्रचलित होते – होते सक्षिप्त रूप में ही लोकप्रिय हो जाते हैं । इस प्रकार हम बड़े से छोटे रूपों में आ जाते हैं-

  • संविद – संयुक्त विधायक दल
  • यू ० पी ० – उत्तर प्रदेश
  • एम ० पी ० – मध्य प्रदेश
  • नाटो – North Atlantic Treaty Organisation
  • जीप – Vehicle for General Purpose
  • रडार – Radio Detection and Ranging
  • नकैनवाद – नलिनविलोचन शर्मा , केसरी कुमार , नरेश द्वारा चलाया गया साहित्यिक वाद युग
  • भाजपा – भारतीय जनता पार्टी

संख्या भी हमें बनाती हैं :

420 धारा ( धोखा देनेवाले अपराधियों पर लगाई जाती है ) इससे प्रभावित हो हम बने — चार सौ बीस , चार सौ बीसी । इसी तरह

  • 10 नंबर से : दस नंबरी
  • 9-2 से बने : नौ दो ग्यारह होना
  • 36 से : छत्तीस का संबंध होना
  • 60 से बने : सठियाना
  • 3-13 से बने : तीन – तेरह होना ‘

नंबर ‘ से तो हम कई रूपों में आ गए-

नम्बरी चोर , सी नम्बर , नंबरी बदमाश , नंबरीलाल आदि ।

रंगों ने हमें कहाँ छोड़ा :

हम रंगों से प्रभावित हो अपना विस्तार करते गए । देखिए न , हम बन गए-

सफेद से सफेदी , सफेदा ( चादर के लिए )
पांडु से पांडुलिपि
सब्ज ( हरा रंग ) से सब्जी , सब्जबाग
पीला से पीलिया
काला से कालीमाता , कालिका , काल कोठरी , काल भैरव
लाल से लाली , लालिमा
सिन्दूर से सिन्दूरी , सिन्दुरिया
नाग ( सिन्दूर रंग ) नारंगी , नागरंगक , नागरंगिका

इस प्रकार हम अनेकानेक आधारों पर बनते रहे हैं ; जनमते रहे हैं और बनते – जनमते रहेंगे ।

हम बढ़ते रहे हैं और बढ़ते रहेंगे हम लोगों के शैक्षिक स्तरों , जलवायु , उच्चारणों के कारण बढ़ जाते हैं । हमारे कुछ उदाहरण देखें : प्लातोन ( यूनानी शब्द ) : अफलातून

कृष्ण किरिसुन , किसुन
स्तबल अस्तबल
गर्म गरम
दवा दवाई
डेढ़ा डेवढ़ा , ड्योढ़ा
नर्म नरम

हम उलट – पुलटकर भी अर्थ नहीं छोड़ते

आपको आश्चर्य होगा । हम कभी स्वयं उलट जाते हैं तो कभी क्षेत्रीय साहित्यकारों द्वारा उलटा दिए जाते हैं । चाहे जैसी परिस्थिति हो , हम उलट – पुलटकर भी मूलार्थ नहीं छोड़ते । देखिए न :

लखनऊ नखलऊ ,नखलवी
कराहनाकहरना
अमरूदअरमूद
मुजरिममुलजिम
बिडाल बिलार
सिगनल सिंगल

कुछ साहित्यकारों की पंक्तियाँ देखें , कैसे कैसे प्रयोग कर डाले हैं उन्होंने –

आवत मुकुट देखि कपि भागे ।

दिन ही लूक परन बिधि लागे । ( तुलसीपास )

x x x x

श्रीपति सुकवि यो वियोगी कहरन लागे ,

मदन को आगि लहरन लागी तन में । ( श्रीपति )

x x x x

कुम्भकरन कइ खोपड़ी दूइत बाँचा भीऊँ ।

( डूबना का जना ) ( जायसी )

हम बड़े मनोरंजक होते है:

केवल कुछ व्यक्ति , वस्तु या दृश्य ही मनोरंजक नहीं होते . हम भी ( शब्द भी ) मनोरंजक हुआ करते हैं । यदि आप छेड़ेंगे तो हम आपको गुदगुदाने लगेंगे :

  • बम प्लेस ( पाखाने के अर्थ में ) : बम पुलिस
  • रेती पर रित पर ) : रेतीपुर , रेवतीपुर
  • खुश रहु ( मैथिली ) : खुशरु . खुसरूपुर
  • कूड़े भार ( एक स्टेशन का नाम ) : कूचे बहार ( बाहर की गली )
  • मयुरा : मुत्रा ( अग्रेजों द्वारा प्रयोग )
  • मधुर : माहुर

दानव देव ऊँच अरु नीचू / अमिय सजीवन माहुर मीचू । ( तुलसीदास )

  • अक्षर : अक्खड़
  • लायब्रेरी : रायबरेली

हम देश और दुनिया का भ्रमण करते हैं और अपना रूप व नाम भी बदल लेते हैं :

केवल पशु – पक्षी और मनुष्य ही नहीं चलते हम भी चलते हैं ; देश – दुनिया का भ्रमण करते है और अपना नाम व रूप भी बदल लेते हैं । नीचे देखें हमारे रूप और नाम :

  • अफीम ( यूनान में )
  • ओपिअम ( लैटिन में )
  • अहिफेन ( भारत में )
  • अफीण ( गुजरात प्रान्त में )
  • अफीम ( महाराष्ट्र में )
  • अ फु युंग ( चीन में )
  • शकर ( फारसी में )
  • शेकर ( कश्मीर में )
  • साकर ( गुजरात में )

हम मोटे – होते – होते प्रतीकात्मक बन जाते हैं :

हमारा अर्थ विकास होते रहा है और विकास करते – करते हम उस जगह पहुँच गए है जारे लोग हमें प्रतीकात्मक मानने लगे । देखना चाहेंगे हमारी बानगी ? तो देख ही लें –

शब्दप्रतीकार्य
रण्डी ऊपर से प्रेम करनेवाली
कौआ काला , चालाक
काला नाग गंभीर पर , छिपी चोट करनेवाला
बन्दर नटखट , नकलची
पत्थर कठोर

हम भी उन्नति कर अपना हृदय परिवर्तित करते हैं :

हम बुरे शब्द भी अच्छे लोगों की संगति कर अपनी उन्नति कर लेते हैं अच्छी परिस्थिति को पाकर हम भी सुन्दर और गौरवपूर्ण बन जाते हैं ।

जैसे — ‘ साहस ‘ के अन्तर्गत हत्या , चोरी , बलात्कार , कठोरता और झूठ आते हैं । इसीलिए ‘ चोर ‘ को ‘ साहसिक भी कहा जाता है , परन्तु वीरों के सम्पर्क में आकर हम ‘ साहसी हो गए और आज हर कोई अपने को ‘ साहसी ‘ कहलाने में गर्व का अनुभव करता है ।

इसी तरह गोस्वामी ‘ शब्द तुलसीदास के सम्पर्क में आकर ईश्वर का पर्याय हो गया ।

‘ मूद ‘ बन गया मुग्ध

क्वीन ( Queen ) शब्द ‘ स्त्री ‘ से रानी के लिए प्रयुक्त हो गया

भोग ( खाना ) शब्द भगवान की संगति पाकर ‘ प्रसाद ‘ बन बैठा

तीर्थ ( तीर पर बसा ) पवित्र स्थान के लिए रूढ़ हो गया

मुनि ( मौन रहनेवाला ) मनन करनेवाले के साथ रहकर तपस्वी या ऋषि बन बैठा ।

हमारी भी अवनति व दुर्गति होती है :

देश , काल और परिस्थिति के कारण हमारी भी बड़ी दुर्गति हो जाती है । नीचे देखें हमारे कुछ नमूने हम कहाँ थे और कहाँ चले गए –

शब्दअवनत रूप
बाबू ( रोब व ठाठवालों के लिए )बाबू ( दफ्तर के कर्मचारियों के लिए )
गुरु ( शिक्षकों के लिए ) आज मक्कारों के लिए
दादा ( बड़े भाई / पितामह के लिए ) आज गुंडों के लिए
भाई ( भ्राता के लिए ) आज गुंडों मवालियों के लिए
नट ( नाट्यकला में प्रवीण के लिए )आज एक जाति विशेष के लिए
पाखंड ( साधुओं का एक सम्प्रदाय ) आज ढोंग आडबर के लिए

5. विशेष अर्थवाले संख्यावाचक :

कुछ संख्यावाचक शब्द ऐसे हैं जो विशेषार्थ के लिए प्राचीन कवियों द्वारा प्रयोग में लाल गए हैं । उनके अर्थ ध्यान में रखने चाहिए । कहीं उनका प्रयोग हो तो अर्थ एवं भाव – ग्रहण आसानी होती है । जैसे : ‘ ‘ आठहुँ सिधि नवौ निधि….”

  • एक : ईश्वर , चन्द्र , सूर्य , पृथ्वी , गणेश का दाँत , शुक्राचार्य का नेत्र
  • दो : दो ( उभय ) पक्ष – कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष
  • दो मार्ग : प्रवृत्ति मार्ग , निवृत्तिमार्ग
  • दो अयन : दक्षिणायन , उत्तरायण
  • दो विद्या : परा विद्या , अपरा विद्या
  • तीन लोक : मृत्युलोक , आकाश , पाताल
  • तीन देव : ब्रह्मा , विष्णु , महेश
  • आग : जठरानल , वड़वानल , दावानल
  • तीन दोष : वात , पित्त , कफ़

अक्षौहिणी सेना : ऐसी सेना , जिसमें 109 , 350 पदाति , 65,610 अश्वारोही , 31,870 रथी और 11,870 गजारोही हो

चौरासी लाख योनियाँ :

4 लाख मनुष्य योनियाँ

9 लाख जलचर योनियाँ और नभचर

11 लाख कृमियोनियाँ

23 लाख पशुयोनियाँ

+ 37 लाख स्थावर योनियाँ

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कुल 84 लाख योनियाँ

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