समास किसे कहते हैं ?




आप जानते हैं समास किसे कहते हैं ? तो आज हम आपको समास के बारे मैं जानकारी देने बाले हैं। जिससे आपको समास किसे कहते हैं ? पता चलेगा। तो आइये जानते हैं “समास किसे कहते हैं ?

समास :

‘ समास ‘ ( Compounds ) का शाब्दिक अर्थ है — संक्षेप । नीचे लिखे वाक्यों को देखें –

राजा का कुमार सख्त बीमार था ।

राजकुमार बीमार था ।

उपर्युक्त वाक्यों में हम देख रहे हैं कि ‘ राजा का कुमार ‘ का संक्षिप्त रूप ‘ राजकुमार ‘ हो गया है ।

अर्थात् दो या अधिक शब्दों का अपने विभक्ति – चिह्नों अथवा अन्य प्रत्ययों को छोड़कर आपस में मिल जाना ही ‘ समास ‘ कहलाता है ।

तात्पर्य यह कि समास में कम – से – कम दो पदों का योग होता है । जब वे दो या अनेक पद एक हो जाते हैं तब समास होता है ।

समास होने के पूर्व पदों के रूप को ( बिखरे रूप ) ‘ समास – विग्रह ‘ और समास होने के बाद बने संक्षिप्त रूप को ‘ समस्तपद ‘ या ‘ सामासिक पद ‘ कहते हैं । ऊपर दिए गए उदाहरणों में ‘ राजा का कुमार ‘ – समास – विग्रह और ‘ राजकुमार ‘ हम ‘ समस्तपद ‘ कहेंगे ।

समास के मुख्यतः चार प्रकार हैं और इन प्रकारों के भी कई उपभेद हुआ करते हैं । देखें-

 समास किसे कहते हैं ?

1. अव्ययीभाव समास

इस समास का पहला पद प्रधान होता है और समस्तपद वाक्य में क्रियाविशेषण ( Adverb ) का काम करता है । इसी कारण से अव्ययीभाव का समस्तपद सदा लिंग , वचन और विभक्तिहीन रहता है । इसके दोनों पदों का स्वतंत्र रूप से पृथक् प्रयोग नहीं होता ; क्योंकि यह प्रायः ‘ नित्य समास ‘ होता है ।

चूँकि उपसर्ग भी अव्यय होते हैं इसलिए उपसर्गों से निर्मित समस्तपद अव्यय का ही काम करते हैं-

अव्ययीभाव समास अनेक अर्थों में विहित है –

( i ) से लेकर / तक आजन्म : जन्म से लेकर / आकठ = कठ तक

( ii ) क्रम : अनुज्येष्ठ = ज्येष्ठ के क्रम से

( iii ) के अनुकूल / के अनुसार : यथाशक्ति = शक्ति के अनुसार / यथासमय = समय के अनुकूल

( iv ) वीप्सा : प्रतिदिन = दिन – दिन

( v ) के योग्य : अनुरूप = रूप के योग्य

( vi ) अभाव : निर्जन = जनों का अभाव / निर्मक्षिक = मक्षिक ( मक्खी ) का अभाव

( vii ) पुनरुक्ति : रातों – रात , हाथों – हाथ , धीरे – धीरे आदि ।

अव्ययीभाव समास की पहचान हैं लक्षण :

अव्ययीभाव समास को पहचानने के लिए निम्नलिखित विधियाँ अपनायी जा सकती है-

( i ) यदि समस्तपद के आरंभ में भर , निर् , प्रति , यथा , बे , आ . ब , उप , यावत् , अधि , अनु आदि उपसर्ग / अव्यय हों । जैसे –

यथाशक्ति , प्रत्येक , उपकूल , निर्विवाद अनुरूप , आजीवन आदि ।

( ii ) यदि समस्तपद वाक्य में क्रियाविशेषण का काम करे । जैसे-

उसने भरपेट ( क्रियाविशेषण ) खाया ( क्रिया )

2. तत्पुरुष समास

वह समास , जिसका उत्तरपद या अंतिम पद प्रधान हो । अर्थात् प्रथम पद गौण हो और उत्तरपद की प्रधानता हो । जैसे — राजकुमार सख्त बीमार था । इस वाक्य में समस्तपद ‘ राजकुमार जिसका विग्रह है – राजा का कुमार । इस विग्रह पद में ‘ राजा ‘ पहला पद और ‘ कुमार ‘ ( पुत्र ) उत्तर पद है । अब प्रश्न है — कौन बीमार था , राजा या कुमार ?

उत्तर मिलता है — कुमार । स्पष्ट है कि उत्तरपद की ही प्रधानता है ।

कुछ और उदाहरण देखते हैं –

राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया है । ( उत्तरपद प्रधान )

पॉकेटमार पकड़ा गया । ( पाकेट नहीं उसको मारनेवाला )

रामचरितमानस तुलसीकृत है । ( कृत ‘ पद की प्रधानता )

अवयव की दृष्टि से तत्पुरुष समास के दो भेद हैं –

A. व्यचिकरण तत्पुरुष

वह तत्पुरुष , जिसमें प्रयुक्त पदों में से पहला पद कर्ताकारक का नहीं हो । ‘ इस तत्पुरुष को ‘ केवल तत्पुरुष भी कहा जाता है । इस समास को पहले पद में लगे कारक चिह्नों के नाम पर ही पुकारा जाता है । ‘ कर्ता ‘ और ‘ संबोधन ‘ को छोड़कर बाकी सभी कारकों से संबद्ध तत्पुरुष समास बनाए जाते हैं । इसके निम्नलिखित प्रकार होते हैं –

1. कर्म या द्वितीया तत्पुरुष : इसमें पद के साथ कर्म कारक के चिह्न ( o , को ) लगे रहते हैं । जैसे

गृहागत = गृह को आगत

पॉकेटमार = पॉकेट को मारनेवाला आदि ।

2. करण या तृतीया तत्पुरुष : जिसके पहले पद के साथ करण कारक की विभक्ति ( से / द्वारा ) लगी हो । जैसे –

कष्टसाध्य = कष्ट स साध्य

तुलसीकृत = तुलसी द्वारा कृत आदि ।

3. सम्प्रदान या चतुर्थी तत्पुरुष : जिसके प्रथम पद के साथ सम्प्रदान कारक के चिन ( को / के लिए ) लगे हों । जैसे-

देशार्पण = देश के लिए अर्पण ।

विद्यालय – विद्या के लिए आलय आदि ।

4. अपादान या पंचमी तत्पुरुष : जिसका प्रथम पद अपादान के चिह्न से युक्त हो । जैसे-

पथभ्रष्ट = पथ से भ्रष्ट

देशनिकाला = देश से निकाला आदि ।

5. संबंध तत्पुरुष या षष्ठी तत्पुरुष : जिसके प्रथम पद के साथ संबंधकारक के चिह्न ( का , के , की ) लगे हों । जैसे-

राजकुमार = राजा का कुमार

पराधीन = पर के अधीन आदि ।

6.अधिकरण या सप्तमी तत्पुरुष : जिसके पहले पद के साथ अधिकरण के चिह्न ( में , पर ) लगे हों । जैसे –

कलाप्रवीण = कला में प्रवीण

आपबीती = आप पर बीती आदि ।

B. समानाधिकरण तत्पुरुष :

जिस तत्पुरुष के सभी पदों में समान कारक ( कर्ता ) पाया जाय । इस समास के अन्तर्गत निम्नलिखित समास आते हैं –

1. कर्मधारय समास ( Appositional ): समानाधिकरण तत्पुरुष का ही दूसरा नाम ‘ कर्मधारय ‘ है । जिस तत्पुरुष समास के समस्तपद समानाधिकरण हों अर्थात् विशेष – विशेषण भाव को प्राप्त हों , कर्ता कारक के हों और लिंग वचन में भी समान हों । दूसरे शब्दों में वह समास जिसमें विशेषण तथा विशेष्य अथवा उपमान तथा उपमेय का मेल हो और विग्रह करने पर दोनों खंडों में एक ही कर्ताकारक की विभक्ति रहे ।

कर्मधारण समास की निम्नलिखित स्थितियाँ होती हैं –

( a ) पहला पद विशेषण दूसरा विशेष्य : महान् , पुरुष = महापुरुष

( b ) दोनों पर विशेषण : भला और बुरा = भलाबुरा

( c ) पहला पद विशेष्य दूसरा विशेषण : श्याम जो सुन्दर है = श्यामसुन्दर

( d ) दोनों पद विशेष्य : आम्न जो वृक्ष है = आम्रवृक्ष

( e ) पहला पद उपमान : घन की भाँति श्याम = घनश्याम

( f ) पहला पद उपमेय : सिंह के समान नर = नरसिंह

( g ) उपमान के बाद उपमेय : चन्द्र के समान मुख = चन्द्रमुख

( h ) रूपक कर्मधारय : मुखरूपी चन्द्र = मुखचन्द्र

( i ) पहला पद कु : कुत्सित पुत्र = कुपुत्र

कुपुत्र ‘ अन् ‘ से शुरु होता है । जैसे पक्व अन्न श्वेत और रक्त वज के समान कठोर मुखरूपी चन्द्र

2. नञ् तत्पुरुष समास : जिसका पहला पद निषेधवाचक रहे । इसका समस्तपद ‘ अ ‘ या ‘ अन् ‘ से शुरु होता है । जैसे-

  • न ज्ञान = अज्ञान
  • न अवसर = अनवसर
  • न अधिकार = अनधिकार आदि ।

3.द्विगु समास ( Numeral Compound ) :

इस समास को संख्यापूर्वपद कर्मधारय कहा जाता है । इसका पहला पद संख्यावाची और दूसरा पद संज्ञा होता है । इसके भी दो भेद होते हैं –

( a ) समाहार द्विगु : समाहार का अर्थ है- समुदाय , इकट्ठा होना या समेटना । जैसे –

  • पंचवटी- पाँच वटों का समाहार
  • चौराहा – चार राहों का समाहार

( b ) उत्तरपद प्रधान द्विगु : इसका पद प्रधान रहता है और पहला पद संख्यावाची । इसमें समाहार नहीं जोड़ा जाता । जैसे – पंचप्रमाण – पाँच प्रमाण

नोट : यदि दोनों पद संख्यावाची हो तो कर्मधारय समास हो जाएगा । जैसे-

  • छत्तीस = छः और तीस
  • इकत्तीस = एक और तीस
  • चौंतीस = चार और तीस
  • चौबीस – चार और बीस

4. मध्यमपदलोपी समास : इसमें बीच के पदों का लोप हो जाया करता है । पहला और अंतिम पद ही जुड़कर समस्तपद का निर्माण करता है । जैसे-

छाया प्रद तरु- छायातरु .( लोप )

गोबर से निर्मित गणेश = गोबरगणेश I ( लोप )

5. प्रादि तत्पुरुष : इस समास में ‘ प्र ‘ आदि उपसर्गों तथा दूसरे शब्दों का समास होता है । प्र आदि के साथ उन्हीं के रूप से दूसरे शब्द भी जुड़े रहते हैं । परन्तु समास करने पर वे लुप्त हो जाते हैं । जैसे-

प्रकृष्ट आचार्य = प्राचार्य

6. उपपद तत्पुरुष : जिस समास का अंतिम पद ऐसा कृदन्त होता है , जिसका स्वतंत्र रूप से ( कृदन्त के रूप में ) प्रयोग नहीं होता । जैसे-

  • कुंभ को करनेवाला = कुंभकार
  • जल में जनमनेवाला – जलज ।

इन उदाहरणों में ‘ कार ‘ और ‘ ज ‘ दोनों अप्रचलित कृदन्त हैं ।

7. अलुक तत्पुरुष : जिस तत्पुरुष के पहले पद की विभक्ति ( कारक चिह्न ) का लोप न होकर उसी में तिरोहित हो जाती है । जैसे –

युद्ध में स्थिर रहनेवाला = युधिष्ठिर

इस उदाहरण में — ‘ युद्ध में ‘ की जगह पर ‘ युधि ‘ हो गया है यानी में ‘ चिह्न मिल गया है ।

इसी तरह – चूहे को मारनेवाला – चूहेमार ।

8. मयूरव्यंसकादि तत्पुरुष : इसके समस्तपद का विग्रह करने पर अंतिम पद पहले आ जाता है ।

  • देशान्तर = भिन्न देश
  • विषयान्तर अन्य विषय
  • एकमात्र – केवल एक

नोट : मध्यमपदलोपी , प्रादि , उपपद , अलुक् और मयूरव्यंसकादि का अस्तित्व संस्कृत में है । हिन्दी में ऐसे उदाहरण बहुत ही कम है ।

3. बहुव्रीहि समास

जिस समास में कोई पद प्रधान न होकर ( दिए गए पदों में ) किसी अन्य पद की प्रधानता होती है । यह अपने पदों से भिन्न किसी विशेष संज्ञा का विशेषण है ।

यह समास भी चार प्रकार का होता है –

1. समानाधिकरण बहुव्रीहि : इसमें जिन पदों का समास होता है , वे साधारणतः कर्ताकारक होते हैं , किन्तु समस्तपद द्वारा जो अन्य उक्त होता है , वह कर्म , करण , सम्प्रदान , अपादान , सम्बन्ध , अधिकरण आदि विभक्ति रूपों में भी उक्त हो सकता है । जैसे –

  • कलह है प्रिय जिसको वह – कलहप्रिय ( कर्म में उक्त )
  • गई हैं इन्द्रियाँ जिससे वह -जितेन्द्रिय ( करण में उक्त )
  • दिया गया है धन जिसके लिए वह- दत्तधन
  • पीत है अम्बर जिसका वह – पीताम्बर ( संबंध में उक्त )
  • चार हैं लड़ियों जिसमें वह = चीलड़ी ( अधिकरण में उक्त )

2. व्यधिकरण बहुव्रीहि : इसमें भी पहला पद कर्त्ताकारक का और दूसरा पद संबंध या अधिकरण कारक का होता है । जैसे –

  • शूल है पाणि में जिसके वह = शूलपाणि
  • वीणा है पाणि में जिसके वह – वीणापाणि
  • चन्द्र है शेखर पर जिसके वह = चन्द्रशेखर

3. तुल्ययोग या सह बहुव्रीहि : जिसका पहला पद सह ( साथ ) हो ; लेकिन ‘ सह ‘ के स्थान पर ‘ स ‘ हो । जैसे –

  • जो बल के साथ है , वह – सवल
  • जो परिवार के साथ है , वह – सपरिवार

4. व्यतिहार बहुव्रीहि : जिससे घात – प्रतिघात सूचित हो । जैसे –

  • मुक्के मुक्के से जो लड़ाई हुई – मुक्कामुक्की
  • लाठी – लाठी से जो लड़ाई हुई – लाठालाठी

बहुव्रीहि समास संबंधी विशेष बातें

> यदि बहुव्रीहि समास के समस्तपद में दूसरा पद ‘ धर्म ‘ या ‘ धनु ‘ हो तो वह आकारान्त हो जाता है । जैसे –

आलोक ही है धनु जिसका वह = आलोकधन्वा

> सकारान्त में विकल्प से ‘ आ ‘ और ‘ क ‘ किन्तु ईकारान्त , ऊकारान्त और ऋकारान्त समासान्त पदों के अन्त में निश्चित रूप से ‘ क ‘ लग जाता है । जैसे –

  • उदार है मन जिसका वह = उदारमनस्
  • अन्य में है मन जिसका वह – अन्यमनस्क
  • साथ हैं पली जिसके वह = सपत्नीक

> बहुव्रीहि समास में दो से ज्यादा पद भी होते हैं ।

> इसका विग्रह पदात्मक न होकर वाक्यात्मक होता है । यानी पदों के क्रम को व्यवस्थित किया जाय तो एक सार्थक वाक्य बन जाता है । जैसे –

  • लंबा है उदर जिसका वह – लंबोदर
  • वह , जिसका उदर लम्बा है ।

> इस समास में अधिकतर पूर्वपद कर्ता कारक का होता है या विशेषण ।

4.द्वन्द्व समास

जिस समास में दोनों पद समानतः प्रधान होते हैं । इसमें समुच्चयबोधक अव्यय का लोप कर दिया जाता है ।

द्वन्द्व समास तीन प्रकार के होते हैं –

1. इतरेतर बन्छ : इस कोटि के समास में समुच्चयबोधक अव्यय ‘ और ‘ का लोप हो जाता है । जैसे — सीताराम , गाय – बैल , दाल – भात , नाक कान आदि ।

2 वैकल्पिक द्वन्द्व : इस समास में विकल्प सूचक समुच्चयबोधक अव्यय ‘ वा ‘ , ‘ या ‘ , अथवा ‘ का प्रयोग होता है , जिसका समास करने पर लोप हो जाता है । जैसे-

  • धर्म या अधर्म = धर्माधर्म
  • सत्य या असत्य- सत्यासत्य
  • छोटा या बड़ा = छोटा – बड़ा

3. समाहार द्वन्द्व : इस कोटि के समास में प्रयुक्त पदों के अर्थ के अतिरिक्त उसी प्रकार का और भी अर्थ सूचित होता है । जैसे –

  • दाल , रोटी वगैरह = दाल – रोटी
  • कपड़ा , लत्ता वगैरह = कपड़ा – लत्ता

ध्यातव्य बिन्दु : जब दोनों पद विशेषण हों और उसी अर्थ में आए तब वह द्वन्द्व न होकर कर्मधारय हो जाता है । जैसे –

भूखा – प्यासा लड़का रो रहा है ।

यहाँ ‘ भूखा – प्यासा ‘ लड़के का विशेषण है । अतः , कर्मधारय के अन्तर्गत आएगा ।

अव्ययीभाव समास में दो ही पद होते हैं । बहुव्रीहि में दो से ज्यादा , तत्पुरुष में भी दो से अधिक पद देखे जाते हैं , परन्तु द्वन्द्व समास में तो बहुत ज्यादा पद भी हो सकते हैं । जैसे –

आज मेहमानों को भात – दाल तरकारी – तिलौड़ी – पापड़ – घी – सलाद – दही आदि खिलाए गए । रेखांकित पद द्वन्द्व समास के हैं ।

आधुनिक नवीन पद्धति : प्रयोग की दृष्टि से समास के मुख्यतः तीन प्रकार माने गए हैं –

1. संज्ञा समास या संयोगमूलक समास इसे ‘ द्वन्द्व समास ‘ अथवा ‘ संज्ञा समास ‘ के नाम से जाना जाता है । इस प्रकार के समास में दोनों पदों पर संज्ञाएँ होती हैं । इसके सभी पद प्रधान होते हैं ; परन्तु जहाँ योजक चिह्न नहीं लगता , वहाँ तत्पुरुष समास होता है । जैसे-

माता – पिता : द्वन्द्व समास

गगाजल : तत्पुरुष समास

2.आश्रयमूलक या विशेषण समास: यह प्रायः कर्मधारय समास होता है । इसका दूसरा पद प्रधान होता है । जैसे-

कच्चामाल – कच्चा माल

3. वर्णनमूलक या अव्यय समास: इस समास के अन्तर्गत बहुव्रीहि और अव्ययीभाव समास आते हैं । इसमें प्रथम पद साधारणतः अव्यय और दूसरा पद संज्ञा का काम करता है । जैसे प्रतिमास आदि ।

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