शब्द – निर्माण किसे कहते हैं ?




आप जानते हैं शब्द – निर्माण किसे कहते हैं ? तो आज हम आपको शब्द – निर्माणके बारे मैं जानकारी देने बाले हैं। जिससे आपको शब्द – निर्माण किसे कहते हैं ? पता चलेगा। तो आइये जानते हैं “ शब्द – निर्माण किसे कहते हैं ?

शब्द – निर्माण :

यौगिक शब्दों के बारे में बताया जा चुका है कि इसमें दो रूढ़ों का प्रयोग होता है । इसके अलावा उपसगों , प्रत्ययों के कारण भी यौगिक शब्दों का निर्माण होता है । नीचे दिए गए उदाहरणों को देखें-

शब्द - निर्माण किसे कहते हैं ?

पो + इत्र = पवित्र ( संधि के कारण )

( ओ + इ )

ऊपर दिए गए उदाहरणों से स्पष्ट है कि उपसर्ग , प्रत्यय , संधि और समास के कारण नये शब्दों का निर्माण होता है । संधि के बारे में हम जान चुके हैं । अब हम क्रमशः उपसर्ग , प्रत्यय और समास विधि से शब्द – रचना सीखेंगे-

उपसर्ग

उप + सर्ग = उपसर्ग

‘ उप ‘ का अर्थ है – समीप या निकट और ‘ सर्ग ‘ का सृष्टि करना ।

” उपसर्ग वह शब्दांश या अव्यय है , जो किसी शब्द के आरंभ में जुड़कर उसके अर्थ में ( मूल शब्द के अर्थ में ) विशेषता ला दे या उसका अर्थ ही बदल दे । ” जैसे –

  • अभि + मान = अभिमान
  • प्र + चार = प्रचार आदि ।

उपसर्ग की तीन गतियाँ या विशेषताएँ होती हैं :-

1. शब्द के अर्थ में नई विशेषता लाना । जैसे –

  • प्र + बल = प्रबल
  • अनु + शासन = अनुशासन

2. शब्द के अर्थ को उलट देना । जैसे –

  • अ + सत्य = असत्य
  • अप + यश = अपयश

3 . शब्द के अर्थ में , कोई खास परिवर्तन न करके मूलार्थ के इर्द – गिर्द अर्थ प्रदान करना । जैसे –

  • वि + शुद्ध = विशुद्ध
  • परि + भ्रमण = परिभ्रमण

उपसर्ग शब्द – निर्माण में बड़ा ही सहायक होता है । एक ही मूल शब्द विभिन्न उपसगों के योग से विभिन्न अर्थ प्रकट करता है । जैसे-

  • प्र + हार = प्रहार : चोट करना
  • आ + हार = आहार : भोजन
  • सम् + हार = संहार : नाश
  • वि + हार = विहार : मनोरंजनार्थ यत्र – तत्र घूमना
  • परि + हार = परिहार : अनादर , तिरस्कार
  • उप + हार- उपहार : सौगात
  • उत् = हार = उद्धार : मोक्ष , मुक्ति

हिन्दी भाषा में तीन प्रकार के उपसर्गों का प्रयोग होता है

  1. संस्कृत के उपसर्ग : कुल 22 उपसर्ग
  2. हिन्दी के अपने उपसर्ग : कुल 10 उपसर्ग
  3. विदेशज उपसर्ग : कुल 12 उपसर्ग

ये उपसर्ग जहाँ कहीं भी किसी संज्ञा या विशेषण से जुड़ते हैं , वहाँ कोई न कोई समास अवश्य रहता है । यह सोचना भ्रम है कि उपसर्ग का योग समास से स्वतंत्र रूप में नये शब्द के निर्माण का साधन है । हाँ , समास के कारण भी कतिपय जगहों पर शब्द – निर्माण होता है ।

अव्ययीभाव समासतत्पुरुष समासबहुव्रीहि समास
आ + जीवन = आजीवन प्र + आचार्य = प्राचार्य प्र + बल = प्रबल : प्रकृष्ट हैं बल जिसमें
प्रति + दिन = प्रतिदिनप्र + ज्ञ = प्रज्ञ निर् + बल = निर्बल : नहीं है बल जिसमें
उप + गृह = उपगृहअति + इन्द्रिय = अतीन्द्रियउत् + मुख =उन्मुख : : ऊपर है मुख जिसका
अभि + मुख = अभिमुखवि + मुख = विमुख : विपरीत है मुख जिसका
अधि + गृह = अधिगृह

दो उपसर्गों से निर्मित शब्द

  • निर् + आ + करण = निराकरण
  • प्रति + उप + कार = प्रत्युपकार
  • सु + सम् + कृत = सुसंस्कृत
  • अन् + आ + हार = अनाहार
  • सम् + आ + चार = समाचार
  • अन् + आ + सक्ति = अनासक्ति
  • अ + सु + रक्षित = असुरक्षित
  • सम् + आ + लोचना = समालोचना
  • सु + सम् + गठित = सुसंगठित
  • अ + नि + यंत्रित = अनियंत्रित
  • अति + आ + चार = अत्याचार
  • अ + प्रति + अक्ष = अप्रत्यक्ष

प्रत्यय

जो शब्दांश , शब्दों के अंत में जुड़कर अर्थ में परिवर्तन लाये , ‘ प्रत्यय ‘ कहलाता है । ” प्रत्यय मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं

( a ) विभक्ति प्रत्यय ( परसर्ग )

संज्ञा ,सर्वनाम पदों के साथ ने ,को ,से आदि प्रत्ययो का प्रयोग होता हैं। हे कारक चिहन हैं। अतः , विभक्ति प्रत्यय ‘ के नाम से जाने जाते हैं ।

संज्ञा से ये प्रत्यय प्रायः अलग रहा करते हैं । ये केवल इस बात का संकेत करते हैं कि उक्त संज्ञा का प्रयोग किस कारक के लिए हुआ है । जैसे –

रामू ने , मोनू को , लड़कों में आदि ।

सर्वनाम के साथ दो तरह की बातें देखी जाती हैं-

( i ) किसी सर्वनाम पद के ठीक बादवाले कारक चिह्न उससे जुड़ जाते हैं । जैसे –

मैंने , तुमको आदि ।

( ii ) यदि सर्वनाम पद के बाद दो कारकों के चिह्न रहें तो पहला चिह्न सर्वनाम से जुड़ता है और दूसरा अलग रहता है । जैसे उनमें से , तुममें से आदि ।

नीचे कुछ सर्वनामों के रूप दिए गए हैं –

‘ मैं ‘ से बने विभिन्न शब्द : मैंने , मुझे , मुझको , मुझसे , मेरे लिए , मेरा , मेरे , मेरी , मुझमें , मुझपर आदि ।

तू / तुम से बने शब्द : तुमने , तुमको , तुम्हें , तुमसे , तुमपर तुममें , तेरा , तेरे तेरी , तुम्हारा , तुम्हारी , तुम्हारे , तुझे , तुझको , तुझसे आदि ।

( b ) स्त्री – प्रत्यय

जिन प्रत्ययों के लगाने से स्त्रीलिंग रूप बनाए जाते हैं , उन्हें ही स्त्री प्रत्यय ‘ कहा जाता है । उदाहरण के अनुसार निम्नलिखित शब्दों के स्त्रीलिंग रूप लिखें –

( i ) ‘ ई ‘ प्रत्यय लगाकर

उदाहरण — देव + ई = देवी

घोड़ा दादा काका चाचा भतीजा भाजा लड़का काला नद बकरा फेरा उसका मेरा तेरा ढलवाँ लँगोट तुम्हारा गीदड़ टोपीवाला बेटा गधा तीतर अच्छा खाया था होगा अधेला हिरन दूधवाला दास पुत्र चुकौता चमोटा घट एकहरा चमड़ा पियक्कड़ लूंगा गोप साला कुत्ता नाला कुत्ता मोटा नगर फूफा गौर जीजा सुन्दर चींटा रस्सा पिटारा पोथा सखा नर्तक पतला पचम कटोरा रोट टोपा कुमार पाता मक्खा

( ii ) ‘ इन ‘ प्रत्यय लगाकर

उदाहरण – तेली + इन = तेलिन

खेलाडी धोबी लठैत दर्जी बाघ कहार सुनार ठठेरा हत्यारा गँजेड़ा पंडा नाती ग्वाला ईसाई हँसोड़ा चमार रीछ नाई जाननहार हलवाई तैराक अहीर लईत चुका कुर्ता मुगा लाला जुलाहा जामादार

( iii ) ‘ आ प्रत्यय लगाकर :

उदाहरण – सुत = सुता

कान्त आत्मज प्रियतम श्याम अध्यक्ष पूज्य चंचल पालित पीत तनय निर्मल अनुज शूद्र महोदय शिव निर्बल प्राचार्य महाशय मूर्ख प्रिय बाल शिष्य छात्र प्रथम मुग्ध भवदीय ज्येष्ठ

( iv ) ‘ आइन ‘ प्रत्यय लगाकर :

उदाहरण – ओझा = ओझाइन

मिसिर पंडित ठाकुर बनिया चौबे धुनिया जमादार सुकुल बुझक्कड़

( v ) इका प्रत्यय लगाकर :

उदाहरण पाठक = पाठिका

बालक धावक नायक श्रावक सेवक लेखक पालक भक्षक गायक संरक्षक प्राध्यापक शिक्षक अध्यापक वाचक निरीक्षक वाहक दायक परिचारक

( vi ) ‘ वती / मती प्रत्यय लगाकर :

उदाहरण – धनवान् = धनवती

बुद्धिमान आयुष्मान् भगवान् भगवन् महान् बलवान् श्रीमान्भाग्यवान्

( vii ) इया प्रत्यय लगाकर :

उदाहरण बन्दर – बन्दरिया बाछा लोटा कुत्ता टोटा इन प्रत्ययों के अतिरिक्त भी अन्य प्रत्यय हैं । जैसे सेठ + आनी = सेठानी जेठ – जेठानी देवर – देवरानी गुरु + आनी = गुरुआनी मोर + नी = मोरनी साधु + वी = साध्वी घट + नी = घटनी आदि ।

( c ) ‘ कृत ‘ प्रत्यय “

क्रिया या धातु ( क्रिया का मूल रूप ) के अन्त में लगनेवाले प्रत्यय को ‘ कृत् ‘ प्रत्यय कहते हैं और इससे बने शब्द को ‘ कृदन्त ‘ कहा जाता है । ‘ ‘ जैसे –

शब्द - निर्माण किसे कहते हैं ?

हिंदी क्रियापद कृत् प्रत्यय हिन्दी क्रियापदों के अन्त में कृत् प्रत्ययों के योग से निम्नलिखित प्रकार के कृदन्त बनाए जाते हैं –

( 1 ) कर्तृवाचक कृदन्त :

कर्तृवाचक कृदन्त क्रिया करनेवाले का बोध कराते हैं यानी ये कृदन्त प्रायः कर्ता कारक का काम करते हैं । जैसे दूध + वाला – दूधवाला

कर्तृवाचक कृदन्त बनाने की निम्नलिखित विधियाँ हैं –

( a ) क्रिया के सामान्य रूप के ‘ ना ‘ को ‘ ने ‘ करके आगे ‘ वाला ‘ जोड़कर । जैसे पढ़ना + वाला = पढ़नेवाला देखना + वाला = देखनेवाला जानना + वाला = जाननेवाला

( b ) क्रिया के सामान्य रूप के ‘ ना ‘ को ‘ न ‘ करके आगे ‘ हार ‘ या ‘ सार ‘ जोडकर जैसे –

जानना + हार = जाननहार मरना + हार – मरनहार मिलना + सार – मिलनसार

( c ) धातु के आगे अक्कड़ , आऊ , आक , आका , आड़ी , आलू , इयल , इया , ऊ , एरा , ऐत ,ओड़ा , ऐया , क , वैया आदि प्रत्यय लगाकर जैसे-

लड़ + आका = अड़ाका खेलाड़ी / खिलाड़ी

निर्देश : नीचे दिए गए क्रिया पदों / धातुओं में कोष्ठक में लिखित प्रत्यय जोड़कर कृदन्त बनाएँ –

भूल ( अक्कड़ ) बूझ ( अक्कड़ ) पी ( अक्कड़ ) धूम ( अन्तु ) उड़ ( अंकू ) तैर ( आक ) लड़ ( आका ) मर ( इयल ) अड़ना ( इयल ) खा ( ऊ ) गाना ( ऐया ) भाग ( ओड़ा ) रोना ( हारा )

( ii ) गुणवाचक कृदन्त

गुणवाचक कृदन्त किसी विशिष्ट गुणबोधक होते हैं । ये कृदन्त आऊ , आवना , इया , वाँ अन्तवाले होते हैं । जैसे

टिकना + आऊ = टिकाऊ बिक + आऊ = बिकाऊ सुहा + आवना = सुहावना लुभा + आवना = लुभावना

( iii ) कर्मवाचक कृदन्त :

कर्मवाचक कृदन्त कर्मबोधक होते हैं यानी Sentence में object का काम करते हैं । ये प्रायः औना , ना , नी आदि प्रत्ययों से बनाए जाते हैं । जैसे –

बिछना + औना = बिछौना खेल + औना = खिलौना करना + नी = करनी पढ़ + ना = पढ़ना

( iv ) करणवाचक कृदन्त :

वे प्रत्ययान्त जो क्रिया के साधन का बोध कराते हैं । वे शब्द धातुओं में आ , आनी , ऊ , न , ना , औटी , ई , नी , औना आदि प्रत्ययों के जोड़ने से बनते हैं । जैसे –

कस + औटी – कसौटी मथ आनी = मथानी झाड़ + ऊ = झाडू बेल + ना = बेलना

( v ) भाववाचक कृदन्त :

धातु के अन्त में अ , अन , आ , आई , आन , आप , आवट , आव , आस , आहट , ई , एरा , औती , त , ती , ति , न , नी , ना इत्यादि प्रत्ययों के जोड़ने से बने शब्द जो भावबोधक हों । जैसे-

लड़ + आई = लड़ाई बैठ + आ = बैठा थक + आवट = थकावट पढ़ + आकू = पढ़ाकू घूम + आव = घुमाव

( vi ) क्रियाद्योतक कृदन्त :

क्रियाद्योतक कृदन्त बीते हुए या गुजर रहे समय के बोधक होते हैं । मूल बातु के आगे ‘ आ ‘ अथवा ‘ या ‘ प्रत्यय लगाने से भूतकालिक तथा ‘ ता ‘ प्रत्यय लगाने से वर्तमानकालिक कृदन्त बनते हैं । जैसे –

भूतकालिक कृदन्तवर्तमानकालिक कृदन्त
लिख + आ = लिखालिख + ता = लिखता
पढ़ + आ = पढ़ाजा + ता – जाता
खा + या – खायाखा + ता- खाता

नोट : कर्तृवाचक प्रत्ययों से ‘ संज्ञा ‘ और ‘ विशेषण ‘ दोनों बनते हैं । गुणवाचक से केवल विशेषण और कर्मवाचक , करणवाचक तथा भाववाचक से सिर्फ संज्ञाओं का निर्माण होता है । क्रियाद्याोतक प्रत्ययों से विशेषण तथा अव्यय बनाए जाते हैं ।

( d ) ‘ तद्धित ‘ प्रत्यय

” क्रियाभिन्न शब्द ( संज्ञा , सर्वनाम , विशेषणादि ) में लगनेवाले प्रत्यय को ‘ तद्धित ‘ कहा जाता है और इससे बने शब्द को ‘ तद्धितान्त ‘ कहते हैं । ” जैसे –

शब्द - निर्माण किसे कहते हैं ?

. तद्धित तद्धितान्त तद्धित प्रत्यय निम्नलिखित होते हैं-

( i ) कर्तृवाचक : कर्तृवाचक तद्धित हैं – आर , इया , ई , उआ , एरा , एड़ी , वाला आदि । इनके जुड़ने से किसी काम के करनेवाले , बनानेवाले या बेचनेवाले का बोध होता है । जैसे-

  • सोना + आर = सुनार
  • दूध + वाला = दूधवाला

( ii ) भाववाचक : भाववाचक प्रत्ययों को संज्ञा या विशेषण के साथ जोड़ने से भाव का बोध होता है । ये प्रत्यय हैं — आ , आई , आस , आयत , आहट , पा , पन , त , ता , त्व , नी , क आदि जैसे –

  • मीठा +आस = मिठास
  • बच्चा + पन = बचपन

( iii ) ऊनवाचक : ऊनवाचक तद्धित प्रत्यय हैं — आ , इया , ओली , ड़ , डी , री आदि । ऊनवाचक प्रत्यय लगाने से वस्तु की लघुता , प्रियता , हीनता आदि का बोध होता है । जैसे –

  • कोठा + री कोठरी ( लघुताबोधक )
  • बाबू + आ = बबुआ ( प्रियताबोधक )
  • बूढ़ी + इया = बुढ़िया ( हीनता / अपमानबोधक )

( iv ) अपत्यवाचक : इस प्रत्यय से आन्तरिक परिवर्तन होता है । इससे बने शब्द माता पिता , स्थान , वंश आदि का बोध कराते हैं । जैसे

  • रघु – राघव ( वंश सूचक )
  • वसुदेव- वासुदेव ( पिता से बना )
  • गंगा – गांगेय ( माता से बना )

कुछ अन्य उदाहरण इस प्रकार हैं –

शब्द - निर्माण किसे कहते हैं ?

( v ) संबंध वाचक : इनसे संबंध का पता चलता है । ये प्रत्यय हैं — एरा , आल , आला , जा , दान आदि । जैसे –

  • मामा + एरा = ममेरा
  • ससुर + आल = ससुराल
  • कलम + दान = कलमदान
  • सॉप + एरा = सँपेरा
  • दुकान + दार = दुकानदार

( vi ) गुणवाचक : गुणवाचक प्रत्ययों के योग से बने शब्द पदार्थ का गुण प्रकट करते हैं । जैसे –

  • भूख से भूखा
  • प्यास से प्यासा
  • चार से चौथा
  • झगड़ा से झगड़ालू
  • रस से रसीला आदि ।

( vii ) स्थानवाचक : ई , इया , अना , डी , इस्तानी , गाह आदि स्थानवाचक तद्धित हैं । ये स्थान का बोध कराते हैं । जैसे-

  • फारस + ई = फारसी
  • चीन + ई = चीनी
  • पाक + इस्तानी = पाकिस्तानी
  • पंजाब + ई = पंजाबी
  • नेपाल + ई = नेपाली
  • बिहार + ई = बिहारी

( viii ) अव्ययवाचक : औं , अ , ओं , तना , भर , यों आदि अव्ययवाचक तद्धित प्रत्यय हैं

  • यह + औं = यहाँ
  • रात + भर + रातभर

नोट : यों तो तद्धित प्रत्यय अनन्त हैं , फिर भी इनके योग से तीन प्रकार के शब्द बनते हैं

( a ) संज्ञा प्रत्यय – विशेषण

  • बिहार + ई = बिहारी
  • ग्राम + ईन = ग्रामीण

( b ) विशेषण + प्रत्यय = भाववाचक संज्ञा

  • भला + आई = भलाई
  • लंबा + आई = लंबाई
  • मीठा + आस = मिठास

( c ) संज्ञा / सर्वनाम / विशेषण + प्रत्यय = अव्यय

  • आप + स = आपस
  • कोस + ओं = कोसों

द्विरुक्ति

द्विरुक्ति का अर्थ है – पुनरुक्ति या आवृत्ति । यह तीन प्रकार की होती है –

1. पूर्ण द्विरुक्ति

एक ही प्रकार के सार्थक शब्द भेद की आवृत्ति से पूर्ण द्विरुक्ति होती है । जैसे-

घर – घर देखा एकहि लेखा ( संज्ञा की द्विरुक्ति )

कोई – कोई , अपना – अपना ( सर्वनाम की द्विरुक्ति )

लाल लाल , मोटे – मोटे ( विशेषण की द्विरुक्ति )

जाते – जाते , खाते – खाते ( क्रिया की द्विरुक्ति )

धीरे – धीरे , पास – पास ( क्रियाविशेषण की द्विरुक्ति )

राम – राम , छि : -छिः ( विस्मयादिबोधक की द्विरुक्ति )

पास – ही – पास , गाँव – का – गाँव ( विभक्ति लगाकर )

2. अपूर्ण विरुक्ति

भिन्न प्रकार के सार्थक या निरर्थक शब्दों की आवृत्ति से अपूर्ण द्विरुक्ति का निर्माण होता है । यह द्विरुक्ति तीन प्रकार से होती है –

( a ) दो सार्थक शब्दों की-

संज्ञा से – काम – धाम , बाल – बच्चे आदि ।

सर्वनाम से जो – सो , जो – कोई आदि ।

विशेषण से काला कलूटा , अंधा – काना आदि ।

क्रिया से हैंसना – रोना , खाना – पीना आदि ।

क्रियाविशेषण से — इधर – उधर , जैसे – तैसे आदि ।

( b ) दो निरर्थक शब्दों की –

अंट – संट , टीम – टाम , झट – पट आदि ।

( c ) एक सार्थक और दूसरा निरर्थक शब्दों की-

संज्ञा – टाल मटोल , पूछ – ताछ आदि ।

विशेषण – ठीक – ठाक , टेढ़ा – मेढ़ा आदि ।

क्रिया – दौड़ना – धूपना आदि ।

अव्यय – आमने – सामने , आस – पास आदि ।

नोट : अपूर्ण द्विरुक्ति को ही सहचर शब्द कहा जाता है । नीचे कुछ सहचर शब्दों के उदाहरण दिए गए हैं

  • रोना – बिलखना
  • आगे – पीछे
  • देवी – देवता
  • छीना – झपटी
  • लड़ाई – झगड़ा
  • दौड़ – धूप
  • घास – पात
  • खान – पान
  • टाल – मटोल
  • पान – पत्ता
  • भाग – दौड़
  • बंधु – बांधव

3. अनुकरण वाचक बिरुक्ति

इस द्विरुक्ति के जोड़ेवाले शब्द परस्पर अनुकरण ( नकल ) करके बने होते हैं । जैसे –

  • मन – मन
  • टन – टन
  • झटाझट
  • टनाटन
  • दनादन
  • खटपटिया
  • मचमचाना
  • झनझनाना
द्विरुक्ति संबंधी विशेष बातें :

हिन्दी में सहधर्मी तथा विषमधर्मी युग्मों का व्यवहार अत्यधिक प्रचलन में है । अतः , इसके प्रयोग – संबंधी नियमों को जानना अत्यावश्यक है । नीचे लिखे नियमों और उदाहरणों को देखें-

( a ) यदि संज्ञा की द्विरुक्ति के बीच में ही आए तो ‘ केवल ‘ का बोध होता है । ‘ ही ‘ के दोनों ओर योजक चिह्न का प्रयोग निश्चित रूप से करना चाहिए । जैसे उसने मन – ही – मन सोचा होगा । 2007 की बाढ़ में सर्वत्र पानी ही पानी था ।

( b ) यदि संज्ञा की द्विरुक्ति के बीच में संबंध का चिह्न आए तो ‘ लगातार ‘ या ‘ अत्यन्त ‘ का बोध होता है । इसमें ‘ का ‘ के दोनों ओर योजक – चिह्न का प्रयोग नहीं करना चाहिए । जैसे वह गधों का गधा है ।

( c ) विशेषण की द्विरुक्ति से अत्यन्त और समस्त का बोध होता है ; परन्तु संख्यावाचक से प्रत्येक का अर्थ प्रकट होता है । जैसे मीठे – मीठे ( बहुत मीठा ) लाल – लाल ( बहुत लाल ) काले काले ( बहुत काला ) एक – एक नर ( प्रत्येक नर )

( d ) यदि एक से दूसरे को उत्कृष्ट या निकृष्ट बताना हो तो विशेषण की द्विरुक्ति के बीच में ‘ से ‘ चिह्न लगाना चाहिए । जैसे – अच्छे – से – अच्छे छात्र बी . पी . एस . में हैं ।

( e ) समुदाय अर्थ में संख्या की द्विरुक्ति बीच में संबंध का चिह्न लेती है । जैसे- दोनों के दोनों आदमी मूर्ख हैं ।

( f ) क्रिया और अव्यय की द्विरुक्ति से बराबर , निश्चय और धीरे – धीरे का बोध होता है । वशीम रो – रो कहने लगा । जब – जब वह मिठाई लाता है , नदीम खा जाता है । नये – नये पौधे ला – लाकर लगाए गए ।

( g ) सहधर्मी युग्मशब्दों को बहुवचन में प्रयोग करने के लिए केवल बादवाले पद को बहुवचन में रूपान्तरित किया जाना चाहिए । जैसे- तुमने तो बाप – दादे की सम्पत्ति समझ रखी है । लोगों ने मार – मार कर चोरों की हड्डी पसलियाँ एक कर दी ।

( h ) विषमधर्मी युग्म प्रायः एकवचन में ही प्रयुक्त होते हैं । यदि उनके बहुवचन रूप का प्रयोग अनिवार्य हो तो दोनों पदों में समान परिवर्तन करना चाहिए । जैसे –

मैं रात – विरात कहीं चला जाता हूँ । ( इस वाक्य में प्रयुक्त युग्म का रूपान्तरण असंभव है । ) मैं कभी – कभी अकेले – दुकेले भी जाता हूँ । ( इसका रूपान्तरण संभव है ) उचित प्रयोग करें ।

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