हिन्दी भाषा का उत्पत्ति कब से हुआ?




हम सभी अपने मन की बात प्रकाश करने के लिए भाषा का प्रयोग हैं। लेकिन सभी एक जैसे भाषा बोल नहीं पाते हैं। इसिलए सभी एक हमारे राष्ट्र भाषा रखा गया ,जो सभी समझ सकते हैं और बोल भी सकते हैं। तो आज हम आपको इसी हिंदी भाषा के बारे मैं जानकारी देने बाले हैं। जिससे आपको हिन्दी भाषा का उत्पत्ति कब से हुआ? इसके बारे मैं पता चलेगा। भाषा हमारे जन्म से मृत्यु तक हमारे साथ ही चलता हैं। तो आइये जानते हैं ” हिन्दी भाषा का उत्पत्ति कब से हुआ ?”

हिन्दी भाषा :

हिन्दी भाषा बहुत सारे विद्वानों का मत है कि हिन्दी भाषा संस्कृत से निणन है , परन्तु यह बात सत्य नहीं है । हिन्दी की उत्पत्ति अपयश भाषाओं से हुई है और अ qn की उत्पति प्राकृत से । प्राकृत भाषा अपने पहले की पुरानी बोलचाल की संस्कृत से निकली है । स्पष्ट है कि हमारे आदिम आर्यों की भाषा पुरानी संस्कृत थी । उनके नमूने ग्वेद में दिखते हैं । उसका विकास होते होते कई प्रकार की प्राकृत भाषाएँ पैदा हुई । हमारी विशुदय संस्कृत किसी पुरानी प्राकृत से ही परिमार्जित हुई है । प्राकृत भाषाओं के बाद अपभशों का जन्म हुआ और उनसे वर्तमान संस्कृतोत्पन्न भाषाओं की । हमारी वर्तमान हिन्दी , अलमागधी और शौरसेनी अपभ्रंश से निकली है ।

‘ हिन्दी भाषा और उसका साहित्य किसी एक विभाग और उसके साहित्य के विकसित रूप नहीं हैं ये अनेक विभाषाओं और उनके साहित्यों की समष्टि का प्रतिनिधित्व करते हैं । एक बहुत बड़े क्षेत्र जिसे चिरकाल से मध्यदेश कहा जाता रहा है की अनेक बोलियों के ताने – बाने से बुनी यही एक ऐसी आधुनिक भाषा है , जिसने अनजाने और अनौपचारिक रीति से देश की ऐसी व्यापक भाषा बनने का प्रयास किया था , जैसी संस्कृत रहती चली आई थी , किन्तु जिसे किसी नवीन भाषा के लिए अपना स्थान तो रिक्त करना ही था ।

वर्तमान हिन्दी भाषा का क्षेत्र बड़ा ही व्यापक हो चला है । इसे निम्नलिखित विभागों में बाँटा गया हैं –

( क ) बिहारी भाषा :

बिहारी भाषा बंगला भाषा से अधिक संबंध रखती है । यह पूर्वी उपशाखा के अंतर्गत है और बैंगला , उड़िया और आसामी की बहन लगती है । इसके अंतर्गत निम्न बोलियाँ हैं मैथिली , मगही , भोजपुरी , पूर्वी आदि । मैथिली के प्रसिद्ध कवि विद्यापति ठाकुर और भोजपुरी के बहुत बड़े प्रचारक भिखारी ठाकुर हुए ।

( ख ) पूर्वी हिन्दी :

अर्द्धमागधी प्राकृत के अपभ्रंश से पूर्वी हिन्दी निकली है । गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस जैसे महाकाव्यों की रचना पूर्वी हिन्दी में ही की । दूसरी तीन बोलियाँ हैं – अवधी , बघेली और छत्तीसगढ़ी । मलिक मोहम्मद जायसी ने अपनी प्रसिद्ध रचनाएँ इसी भाषा में लिखी हैं ।

( ग ) पश्चिमी हिन्दी :

पूर्वी हिन्दी तो बाहरी और भीतरी दोनों शाखाओं की भाषाओं के मेल से बनी हैं : परन्तु पश्चिमी हिन्दी का संबंध भीतरी शाखा से है ।

यह राजस्थानी , गुजराती और पंजाबी से संबंध रखती है । इस भाषा के कई भेद हैं – हिन्दुस्तानी , ब्रज , कन्नौजी , बुंदेली , बौंगरू और दक्षिणी ।

गंगा यमुना के बीच मध्यवर्ती प्रान्त में और उसके दक्षिण दिल्ली से इटावे तक ब्रजभाषा बोली जाती है । गुड़गाँव और भरतपुर , करोली और ग्वालियर तक ब्रजभाषी हैं । इस भाषा के कवियों में सूरदास और बिहारीलाल ज्यादा चर्चित हुए ।

कन्नौजी , ब्रजभाषा से बहुत कुछ मिलती जुलती है । इटावा से इलाहाबाद तक इसके बोलनेवाले हैं । अवध के हरदोई और उन्नाव में यही भाषा बोली जाती है ।

बुंदेली बुंदेलखंड की बोली है । झाँसी , जालौन , हमीरपुर और ग्वालियर के पूर्वी प्रान्त , मध्य प्रदेश के दमोह छत्तीसगढ़ के रायपुर , सिउनी , नरसिंहपुर आदि स्थानों की बोली बुंदेली है । छिंदवाड़ा और हुशंगाबाद के कुछ हिस्सों में भी इसका प्रचार है ।

हिसार , झींद , रोहतक , करनाल आदि जिलों में बाँगरू भाषा बोली जाती है । दिल्ली के आसपास की भी यही भाषा है ।

दक्षिण के मुसलमान जो हिन्दी बोलते है उसका मुंबई , बरोदा , वरार , मध्य प्रदेश , कोचीन , कुग , हैदराबाद , चेन्नई , माइसोर और ट्रावनकोर तक कले हैं । इन क्षेत्रों के लोग मुझे या मुझको की जगह मेरे को बोलते हैं ।

हिन्दुस्तानी भाषा के दो रूप हैं । एक तो वह जो पश्चिमी हिन्दी की शारना है , दूसरी वर जो साहित्य में काम आती है । पहली गंगा यमुना के बीच का जो भाग है उसके उत्तर में रुहेलखंड में और अन्याला जिले के पूर्व में बोली जाती है । यह पश्चिमी हिन्दी की शाखा है । यही धीरे – धीरे पंजाबी में परिणत हुई । मेरठ के आस – पास और उसके विशुद्ध रूप में बोली जाती है । यहाँ उसका वही रूप है , जिसके अनुसार हिन्दी का व्याकरण बना है । कोलखा में यह धीरे – धीरे कन्नौजी में और अंबाले में पंजाबी परिणत हो गई है । अर्थात् हिन्दुस्तानी और कुछ नहीं , सिर्फ ऊपरी दोआब की स्वदेशी भाषा है । दिल्ली में मुसलमानों के सहयोग से हिन्दी भाषा का विकास बहुत बढ़ा ।

वर्तमान समय में इस भाषा का प्रचार इतना बढ़ गया है कि कोई प्रान्त , सूबा या शहर ऐसा नहीं रह इसके बोलनेवाले न हों । बंगाली , मद्रासी , गुजराती , मराठी , नेपाली आदि भिन्न भाषाएँ । फिर भी ये भाषा – भाषी हिन्दी को समझ लेते हैं । इसका व्याकरण है इस भाषा में संस्कृत के अलावा फ्रेंच , जापानी , बर्मी , चीनी अंग्रेजी , पुर्तगाली आदि अनेकानेक भाषाओं के शब्दों की भरमार है । अतएव , इस भाषा का फैलाव बहुत तेजी से हुआ है । यही कारण है कि आज यह राष्ट्रभाषा का कर चुकी है ।

  • राजस्थानी हिन्दी का विकास ‘ अपभ्रंश से हुआ ।
  • पश्चिमी हिन्दी का विकास ‘ शौरसेनी ‘ से हुआ ।
  • ‘ पूर्वी हिन्दी का विकास ‘ अर्द्धमागधी ‘ से हुआ ।
  • बिहारी हिन्दी का विकास ‘ मागधी ‘ से हुआ ।
  • ‘ पहाड़ी हिन्दी ‘ का विकास ‘ खस ‘ से हुआ ।

देबनागरी लिपि

‘ हिन्दी ‘ और ‘ संस्कृत ‘ देवनागरी लिपि में लिखी जाती है । देवनागरी लिपि का विकास ब्राह्मी लिपि ‘ से हुआ , जिसका सर्वप्रथम प्रयोग गुजरात नरेश जयभट्ट के एक शिलालेख में मिलता है । 8 वीं एवं 9 वीं सदी में क्रमशः राष्ट्रकूट नरेशों तथा बड़ौदा के ध्रुवराज ने अपने देशों में इसका प्रयोग किया था । महाराष्ट्र में इसे बालबोध ‘ के नाम से संबोधित किया गया ।

देवनागरी लिपि पर तीन भाषाओं का बड़ा महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा ।

( i ) फारसी प्रभाव : पहले देवनागरी लिपि में जिह्वामूलीय ध्वनियों को अंकित करने के चिह्न नहीं थे , जो बाद में फारसी से प्रभावित होकर विकसित हुए क ख ग ज़ फ़ ।

( ii ) बांग्ला प्रभाव : गोल – गोल लिखने की परम्परा बांग्ला लिपि के प्रभाव के कारण शुरू हुई ।

( iii ) रोमन – प्रभाव : इससे प्रभावित हो विभिन्न विराम – चिह्नों , जैसे — अल्प विराम , अर्द्ध विराम , प्रश्नसूचक चिह्न , विस्मयसूचक चिह्न , उद्धरण चिह्न एवं पूर्ण विराम में ‘ खड़ी पाई ‘ की जगह ‘ बिन्दु ‘ ( Point ) का प्रयोग होने लगा ।

देवनागरी लिपि की विशेषताएँ :

  • इसके ध्वनिक्रम पूर्णतया वैज्ञानिक हैं ।
  • प्रत्येक वर्ग में अघोष फिर सघोष वर्ण हैं ।
  • वर्गों की अंतिम ध्वनियाँ नासिक्य हैं ।
  • छपाई एवं लिखाई दोनों समान हैं ।
  • ह्रस्व एवं दीर्घ में स्वर बँटे हैं ।
  • निश्चित मात्राएँ हैं ।
  • उच्चारण एवं प्रयोग में समानता है ।
  • प्रत्येक के लिए अलग लिपि चिह्न है ।

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