वर्तनी किसे कहते हैं ?




आप जानते हैं वर्तनी किसे कहते हैं ? तो आज हम आपको वर्तनी के बारे मैं जानकारी देने बाले हैं। जिससे आपको वर्तनी किया हैं पता चलेगा। तो आइये जानते हैं “वर्तनी किसे कहते है ?”

वर्तनी :

वर्तनी को उर्दू मैं ‘ हिज्जे ‘ और अंग्रेजी में ‘ Spelling ‘ कहा जाता है ।

जिस शब्द मैं जितने वर्ण या अक्षर जिस अनुक्रम में प्रयुक्त होते हैं , उन्हें उसी क्रम में ‘ वर्तनी ‘ को उर्दू जिस शब्द में जितने वर्ण या अक्षर जिस लिखना ही ‘ वर्तनी ‘ है ।

इसकी शुद्धता – अशुद्धता दो बातों पर निर्भर करती है –

  1. उच्चारण और
  2. अध्ययन एवं अभ्यास

यदि कक्षाओं में शिक्षक और छात्र उच्चारण पर ध्यान दें , बोल बोलकर पढ़ें ( मौन पाठ नहीं ) , एकाग्रचित्त होकर वर्णों एवं उनके क्रमों पर ध्यान दें तो निश्चित रूप से निरन्तर उनकी शुद्धता बढ़ती जाएगी ।

यहाँ वर्तनी संबंधी कुछ विशेष जानकारियाँ दी जा रही हैं ; लिखते एवं बोलते समय इन नियमों का मनन करने से वर्तनी – दोष निश्चित रूप से दूर हो जाएगा –

1. वर्गों की लिखावट में सावधानी :

हिन्दी वर्णमाला के कुछ वर्णों की लिखावट में सावधानी की जरूरत है । यदि इस पर ध्यान नहीं दिया जाय तो दूसरों को पढ़ने में काफी दिक्कत हो सकती है ।

अ – आ – ओ – औ

उपर्युक्त वर्गों के लेखन में पड़ी पाई को ठीक बीच में न लिखकर नीचे लिखना चाहिए ‘ ओ ‘ लिखने में तो सावधानी बरती जाती है , परन्तु ‘ औ ‘ लिखने के भ्रमवश बच्चे और सयाने प्रायः ‘ औ ‘ ऐसा लिख देते हैं । इससे बचना चाहिए ।

‘ ख ‘ को ‘ र व ‘ की तरह न लिखें इससे ‘ ख ‘ , ‘ रव ‘ बनकर वर्ण से शब्द बन जाएगा और अर्थ हो जाएगा — दाना । जैसे — रवादार ( दानेदार )

‘ घ ‘ पर पूरी शिरोरेखा होती है जबकि तवर्गीय व्यंजन ‘ ध ‘ का पूर्व का गोलवाला शिरा मुड़ा होता है और मुड़े भाग तथा शिरोरेखा के बीच रिक्त स्थान रहता है ।

इसी तरह थ , भ , य , श , क्ष और श्र की लिखावट में ऊपर से मुड़े भाग के ऊपर शिरोरेखा नहीं होती । ‘ भ ‘ के ऊपर पूरी तरह से शिरोरेखा देने पर ‘ म ‘ का भ्रम पैदा हो सकता है ।

द्य , द्द और द्ध लिखने में भी सावधानी की जरूरत ‘ घ ‘ – ‘ द् ‘ और ‘ य ‘ का संयुक्त रूप है । इसमें स्पष्टतया ‘ द् ‘ और ‘ य ‘ का रूप दिखना चाहिए । यदि ‘ द्य ‘ लिखने में कठिनाई हो तो दोनों को अलग करके इस रूप में लिखना चाहिए – द्य – विद्या – विद्या

६ ‘ यह चवर्ग का ‘ छ ‘ नहीं है , युक्ताक्षर द्वित्व है । इसमें ‘ द् ‘ , ‘ द ‘ से संयुक्त हुआ है । इसे भी ‘ द ‘ की तरह लिखकर वर्तनी दोष से बचा जा सकता है । जैसे — उद्देश्य – उद्देश्य ‘

द्ध ‘ लिखने में छात्र प्रायः ‘ द्ध ‘ लिखकर अनर्थ कर बैठते हैं । मैंने ऊपर बताया है कि ‘ ध ‘ ।

का ऊपरी शिरा मुडा होता है । इसलिए ‘ द् ‘ का ‘ ध ‘ के साथ संयुक्त करने में या तो ‘ च ‘ को ‘ य ‘ की तरह लिखें या दोनों को अलग-अलग दूध – प्रसिद्ध सिद्ध ।

इसी तरह दवर्गीय पंचमाक्षर दो रूपों में लिखा जाता है – ‘ ण ‘ और ‘ या ‘ यदि दूसरे रूप में लिखना चाहते है तो ‘ र ‘ के साथ दोनों पाई को सटाकर लिखें इस तरह नहीं – सा

2. उच्चारण में ‘ अ का भ्रम :

कुछ ऐसे संयुक्ताक्षर वाले शब्द होते हैं , जिनमें ‘ अ ‘ की भ्रान्ति देखी जाती है । यदि ‘ अ ‘ को हल्का यानी झटके के साथ बोला जाए ( यद्यपि पूर्व में ‘ अ ‘ नहीं है तथापि ) तो यह कठिनाई नहीं होगी और शुद्धता भी बनी रहेगी । जैसे-

स्थानस्मारकस्तूप
स्कूलस्थायीस्तुति
स्नानस्त्रोतस्त्री
स्पर्शश्मशानस्थूल

3. ‘ इ / ई का भ्रम :

ध्वनि पाठ में पढ़ा जा चुका है कि ‘ इ ‘ मूल स्वर है और ‘ ई ‘ दीर्घ स्वर । ‘ इ ‘ को हल्का और ‘ ई ‘ को स्वराघात के साथ उच्चरित करने पर यह भूल नहीं होगी । ‘ इ ‘ की मात्रा से पूर्व के वर्ण को स्वराघात के साथ और बादवाले को झटके से बोलने पर हस्व स्पष्ट उच्चरित होगा । जैसे –

मति ( ‘ म ‘ पर जोर ‘ ति ‘ को झटके से )

इसी तरह गति , तिथि , बुद्धि , रीति , नीति आदि का उच्चारण करें ।

‘ इ ‘ / ‘ ई ‘ न रहते हुए भी इसकी उपस्थिति का भ्रम पैदा करनेवाले कुछ शब्द हैं :

स्त्री ( स् ‘ से पहले ‘ इ ‘ का आना )

प्यास ( ‘ पू ‘ से पहले ‘ इ ‘ का आना )

ध्यान ( ‘ ध् ‘ से पहले ‘ इ ‘ का आना )

ज्ञान ( ‘ ज्ञ ‘ से पहले ‘ इ ‘ का आना )

इसी प्रकार , त्यों , ज्यों , प्यार , ज्योत्स्ना , क्या , हृष्ट , व्यापक , व्यूह , क्यों , व्याकरण आदि में ‘ इ ‘ की मात्रा न रहते हुए भी इसके होने का भ्रम रहता है ।

नीचे कुछ ऐसे शब्द दिए जा रहे हैं जिनमें अनावश्यक रूप से ‘ इ ‘ की मात्रा का प्रयोग कर दिया जाता है –

अशुद्ध अहिल्या अहल्या द्वारिका द्वारका छिपकिली छिपकली वापिस वापस फिजूल फजूल पहिला प्रदर्शिनी प्रदर्शनी पहला

4. ‘ उ ‘ / ‘ ऊ ‘ का भ्रम :

कहीं – कहीं ‘ उ ‘ / ‘ ऊ ‘ का भ्रम देखा जाता है । जैसे –

स्वास्थ्य ( ‘ स् ‘ में ‘ उ ‘ का भ्रम )

स्वागत ( ‘ स् ‘ में ‘ उ ‘ का भ्रम )

स्वप्न ( ‘ स् ‘ में ‘ उ ‘ का भ्रम )

स्वर्ण ( ‘ स् ‘ में ‘ उ ‘ का भ्रम )

इसी तरह ,स्वस्थ स्वचालित स्वाध्याय स्वाभाविक स्वार्थ स्वांग स्वभाव स्वल्प इस भ्रम का एक कारण तो यह है कि यण स्वर संधि के कारण ‘ उ ‘ का ‘ व ‘ में रूपान्तर होता है । जैसे –

सु + अल्प= स्वल्प

सु + आगत=स्वागत

परन्तु , सभी शब्दों में ऐसा नहीं होता । जैसे –

स्व + अर्थ = स्वार्थ

स्व + अध्याय = स्वाध्याय

ध्यातव्य : उपर्युक्त शब्दों में मुख्य रूप से एक बात ही सामने आती है कि प्रायः ‘ स्व ‘ से शुरू होनेवाले शब्दों में ही ‘ उ ‘ की मात्रा का प्रम होता है । ध्यान रहे , यदि उच्चारण एकदम हल्का यानी झटके से हो तो उसमें अ , इ , उ या ऊ की मात्रा नहीं आएगी ।

5. ” छ ‘ , ‘ च्छ ‘ और ‘ क्ष ‘ का भ्रम :

हम जानते हैं कि ‘ छ ‘ एक स्वतंत्र व्यंजन वर्ण है जबकि ‘ छ ‘ और ‘ क्ष ‘ संयुक्त व्यंजन । ‘ च्छ ‘ के उच्चारण में ‘ अ ‘ का आभास नहीं होता , लेकिन ‘ क्ष ‘ में ऐसा होता है । ‘ क्ष ‘ के उच्चारण में ‘ अ ‘ के आभास का कारण है .- ‘ क्ष ‘ की रचना या उत्पत्ति में ‘ अ ‘ की सहभागिता

क + ष + अ = क्ष

हम देखते हैं कि ‘ क् ‘ और ‘ ए ‘ दोनों अस्वर व्यंजन हैं और ‘ अ ‘ स्वर है । यद्यपि दोनों में ( क और ष ) स्वर नहीं है , तथापि उच्चारण करने में ‘ अ ‘ की उपस्थिति का आभास होता है ।

‘ च्छ ‘ और ‘ छ ‘ में ‘ अ ‘ की उपस्थिति है , परन्तु ‘ क्ष ‘ की तरह पूर्व में नहीं । ‘ क्ष ‘ का उच्चारण ‘ अक्छ ‘ की तरह होता है और मूर्धा की भूमिका बढ़ जाती है । अतः , यदि ‘ क् ‘ युक्त ‘ छ ‘ का उच्चारण हो तो ‘ क्ष ‘ का प्रयोग करना चाहिए और ‘ क् ‘ नहीं रहने पर ‘ छ या ‘ च्छ ‘

दूसरी बात यह कि ‘ छ ‘ के उच्चारण में संगम नहीं होता ; परन्तु ‘ च्छ ‘ के उच्चारण से पूर्व हल्का सा ठहराव देखा जाता है । इन शब्दों के उच्चारण पर ध्यान दें-

कुछ ( एक साथ उच्चारण )

अच्छा ( ‘ अ ‘ के बाद हल्का ठहराव )

तीसरी और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ‘ क्ष ‘ का प्रयोग प्रायः तत्सम शब्दों ( संस्कृत के शब्दों ) में होता है , जबकि ‘ छ ‘ का देशज में । जैसे-

तत्समदेशज
क्षणक्षेत्रक्षतिछाताछातीछत
शिक्षाप्रतीक्षाक्षत्रियछलियाछिटकनाछटपटाना
अक्षयसाक्षीलक्षछड़ीछनछनाहटछुछुन्दर
लक्ष्यनिरीक्षकनक्षत्रछप्परछाछछुरी
परीक्षाअधीक्षकसमक्षछदामछलछाली
प्रत्यक्षअपेक्षाउपेक्षाछापनाछपाकबाछा
समीक्षादीक्षाक्षीण
शिक्षकशिक्षिकाक्षिण

6. ‘ ण ‘ और ‘ न ‘ का प्रयोग :

सावधानीपूर्वक उच्चारण नहीं करने के कारण इन दोनों वर्गों में भ्रम की स्थिति पैदा होती है । हमारे प्रारंभिक शिक्षक इसके लिए ज्यादा जिम्मेदार हैं । वे ‘ ण ‘ को बड़ी ‘ न ‘ या ‘ ञ ‘ अथवा मूर्धन्य न और ‘ न ‘ को ‘ न ‘ या छोटी ‘ न ‘ कहकर छात्र – छात्राओं को भ्रमित कर देते हैं ।

ये दोनों नासिक्य व्यंजन हैं । ‘ ण ‘ के उच्चारण में वायु मुर्धा को छूती हुई नाक से निकली , जबकि ‘ न ‘ के उच्चारण में वायु दाँत को छूती हुई नाक से निकला करती है । इसलिए . की ‘ ण ‘ को ‘ अर्जे बा मूर्धन्य ‘ न ‘ और ‘ न ‘ को सीधे न ‘ या दन्त्य ‘ न ‘ कहा जाय तो भ्रम न के बरावर होगा ।

सामान्यतया , ऋ , र . ष के बाद ‘ ण ‘ का प्रयोग होता है , परन्तु मध्य में कोई स्वर या कवर्गीय या पवर्गीय व्यंजन अथवा य , व , ह रहे तो ‘ न ‘ का प्रयोग होगा ।

नीचे के उदाहरणों को देखकर चिन्तन करें :

ण ‘ का प्रयोग न ‘ का प्रयोग
शरणमरणहरणकहनासुनानारचनाभरना
कणफणरण ( युद्ध )मरनाजलनाबहनाअर्चना
प्रसारणरमणभ्रमणरन ( खेल में )रसायनबलवान
भूषणआभूषणदर्पणप्रार्थनाजलपानमहानविद्वान
आकर्षणरामायणअनुसरणपरिवर्तनवेचनाअध्ययन
चरणसमरणकरणगमननमनशमनगवन
उच्चारणअधिकरणलक्ष्मणमूर्च्छनागलनाज्ञानविज्ञान
सचरणसंस्करणभरण

‘ ण ‘ का संयोग स्वर्गीय व्यंजनों के साथ और ‘ न ‘ का तवर्गीय के साथ होता है । जैसे

‘ ण ‘ का सयोग ‘ न का संयोग घण्टा डण्डा भण्डा अन्तर अण्डा पण्डा झण्डा जन्तर अन्त पण्डित खण्डित अण्डज निश्चिन्त ग्रन्थ

च्यात्ताव्य : उक्त शब्दों को अनुस्वार लगाकर भी लिखा जाता है : घंटा , डंडा , मडा , अंडा पड़ा झंडा , पंडित , खंडित , अंडज , अंतर , अदर , बंदर , जतर , मंतर , अंत , कांत , शांत , निश्चित हेमंत ग्रंथ , बलवत

7. ‘ब ‘ और ‘व ‘का भ्रम :

‘ ब ‘ और ‘ व ‘ के प्रयोग में सतर्क रहना चाहिए । ध्यान रहे कि संस्कृत में ब ‘ का प्रयोग नहीं के बराबर होता है , ठीक इसके विपरीत हिन्दी में ‘ ब ‘ का प्रयोग ज्यादा होता है । नीचे लिखे शब्दों पर ध्यान दें –

‘ब’ वाले संस्कृत शब्द : बधु , ब्रह्म , ब्रह्मा , बकुल , बक ( बगुला ) , ब्राह्मण , आबद्ध , आबंध , पदबंध , बुध , वर्वर , बाधा , बाला , बलि , बुभुक्षा , बिबिसार , बीज , बालक , बालिका , प्रतिबिम्ब , बृहत , बंध्या . ब्रह्मांड

 व’ वाले संस्कृत शब्द : वायु , विलास , वधू , वसंत , वचन , वर्जन , विनय , व्यवहार , व्याज व्याल , वंश , वन्दना , वदन , वत्स , वहन , निर्वहन , वक्र , व्यास , व्याधि , व्यथा , व्यवधान , स्वभाव , स्वर्ग स्वान्त , स्वार्थ , स्वल्प , स्वाधीन , स्वस्थ , वंचना , वपु , वर्ण , वन्य , वसुधा , विजय , वाचाल , व्यापक

हिन्दी उर्दू में प्रयुक्त ‘ ब ‘ वाले कुछ शब्द : बसंत , बदमाश , बंदिश , बकरा , बंदूक , जवाब हिसाब , किताब , बगावत , नवाब , बगदाद , बेवकूफ , बेमतलब , बदजात , बज , ब्रज , बिनाकारण बदत्तमीज , बदहजमी , बदनसीब , बदहाली , बंदगी , बारात , बलात्कार , बला , बुलंद , बुनकर , यूनाः बुढ़ापा , बीमार , बहुलीकरण , बनाना , बिगाड़ना , बदसूरत , बदा , बलशाली ।

वट ‘ प्रत्ययान्त शब्दों में भूलकर भी ‘ वट ‘ की जगह ‘ बट ‘ नहीं लगाना चाहिए । जैसे-

थकावट , बनावट , सजावट , लिखावट , मिलावट आदि ।

ध्यातव्य : कहीं कहीं ‘ व ‘ एवं ‘ ब ‘ के प्रयोग से एक ही शब्द के अर्थ में भारी भेद देखा जाता है , इसलिए पूरी सावधानी से इनका प्रयोग करना चाहिए । जैसे –

बहन – भगिनी ,बहिन ( Sister )
बात – वचन , बोलीवात – हवा
बाद – उत्तर ( After )वाद – तर्क , विचार
बास – महक , गन्धवास – निवास
बन्दी – कैदीवन्दी – भाट / चारण
बार – दफावार – हमला , चोट , दिन

नोट : हम ऐसे शब्दों की विस्तृत चर्चा श्रुतिसम भिन्नार्थक या युग्म शब्द सूची में करेंगे ।

8. ‘ ढ ‘ एवं ‘ ढ ‘ का प्रयोग :

ध्वनि पाठ में बताया जा चुका है कि ‘ ढ ‘ , ‘ ढ ‘ का ही विकसित रूप है । ‘ ढ ‘ के उच्चारण में हल्का ‘ र ‘ की झलक होती है । इन दोनों के प्रयोग में यही अन्तर है कि ‘ द ‘ का प्रयोग शब्दों के मध्य या अन्त यानी प्रथम वर्ण छोड़कर कहीं भी किया जाता है जबकि ‘ ढ ‘ का सिर्फ शुरू में । नीचे के उदाहरणों को ध्यानपूर्वक देखें-

ढोलक , ढूँढ़ , पढ़ना , चढ़ना , गढ़ना , मढ़ना , बढ़ना , ढलान , गढ़ , चढ़ाई , बाढ़ , मेढ़क , ढक्कन बढ़ई , ढीठ आदि ।

इसी तरह , ‘ ड ‘ का प्रयोग मध्य या अन्त में और ‘ इ ‘ का शुरू में करना चाहिए :

डमरू , डगमगाना , डकार , डकैत , उड़ना , सड़क , जड़त्व , तड़पना , भड़क आदि ।

9. ‘ श ‘ , ‘ ष ‘ एवं ‘ स ‘ का प्रयोग :

→ यदि किसी शब्द में ‘ स ‘ हो और उसके पहले ‘ अ ‘ या ‘ आ ‘ हो तो ‘ स ‘ नहीं बदलता । जैसे-

दस ( ‘ स ‘ के पहले ‘ अ ‘ )

पास , घास , विश्वास , इतिहास . ( ‘ स ‘ के पहले ‘ आ ‘ )

→ यदि अ / आ से भिन्न स्वर रहे तो ‘ ष ‘ का प्रयोग होता है । जैसे –

विषम , भूषण , प्रेषित , आकर्षित , हर्षित , धनुष , पुरुष , पौरुष , आभूषण , आकर्षण आदि ।

→ टवर्ग के पूर्व ‘ ष ‘ का प्रयोग होता है । जैसे —

क्लिष्ट , विशिष्ट , शिष्ट , षोडश , नष्ट , षडानन , कष्ट , भ्रष्ट , आदि ।

→ ‘ ऋ ‘ के बाद ‘ ष ‘ का प्रयोग होता है । जैसे –

ऋषि , महर्षि , कृषि , वृष्टि , कृषक , तृषित , ऋषभ ,

→ आगे चवर्ग , रहने पर ‘ श ‘ का प्रयोग होता है । जैसे —

निश्चित , निश्चय , निश्चिन्त , निश्छल आदि ।

 यदि ‘ श ‘ एवं ‘ ष ‘ दोनों का साथ प्रयोग हो तो पहले ‘ श ‘ फिर ‘ ष ‘ का प्रयोग होगा । यदि ‘ स ‘ भी रहे तो क्रमशः स , श और ष होगा । जैसे —

विशेष , विशेषण , शेष , विशेष्य , शोषण , शीर्षक , विश्लेषण , संश्लेषण आदि ।

 उपसर्ग के रूप में आनेवाले ‘ निः ‘ ‘ वि ‘ के साथ मूल शब्द का ‘ स ‘ ज्यों का त्यों रहता है । जैसे –

निःसंशय , विस्तार , विस्तृत , निःसंदेह , विस्तीर्ण आदि ।

→ आगे ‘ तवर्ग ‘ रहने पर ‘ स ‘ का प्रयोग होता है ।

जैसे — विस्तार , निस्तार , प्रस्तर , स्तरीय , स्थायी आदि ।

 प्रायः ऐसा देखा जाता है कि जिन तत्सम शब्दों में ‘ श ‘ रहता है , उनके तद्भव में ‘ स ‘ आ जाता है । जैसे –

तत्समतद्भव
शूलीसूली
शाकसाग
शिरसिर
शूकरसूअर
श्वसुरससुर

नोट : दोनों रूप प्रचलन में हैं ।

→ संधि करने पर क , ख , प , फ , ट , ठ आदि के पूर्व आनेवाला विसर्ग सदा ‘ ष ‘ में परिणत हो जाता है । जैसे –

पृ : + ठ > पृष् + य > पृष्ठ

निः + कपट = निष्कपट निः + फल = निष्फल निः + काम = निष्काम

10. ‘ अनुस्वार ‘ और ‘ चन्द्रबिन्दु ‘ का प्रयोग :

शिरोरेखा से ऊपर लिखी जानेवाली मात्राओं के ऊपर सामान्यतया ‘ अनुस्वार ‘ तथा नीचे लिखी जानेवाली मात्राओं के ऊपर चन्द्रबिन्दु का प्रयोग होता है । जैसे –

शिरोरेखा के ऊपरशिरोरेखा के नीचे
मैं, क्यों , हैं , उन्होंने , उन्हें , इन्हें , इन्होंने , कहाँ ,
किन्हें , किन्होंने , जिन्हें , जिन्होंने
आँगन , अँगना , जहाँ , गाँधी , आँधी ,
काँख , आँख , जाँघ , माँद , नाँद , बाँध

पंचमाक्षर के बदले भी अनुस्वार का प्रयोग होता है । पंचमाक्षरवाले शब्दों का प्रयोग तत्सम ( संस्कृत ) में ज्यादा होता है । जैसे-

पंचमाक्षरवालेअनुस्वारवाले
गङ्गा , वन्दना , चञ्चल , खञ्जन सम्पादक ,
बन्दर , अन्त , सम्भव
गंगा , बंदना , चंचल , खंजन
संपादक , बंदर , अंत , संभव

11. ‘ ज ‘ एवं ‘ ज ‘ का प्रयोग :

‘ ज ‘ एक अत्यन्त संघर्षी व्यंजन है । इसके उच्चारण में तालु से ज्यादा रगड़ खाती है । यह प्रायः उर्दू फारसी के शब्दों में प्रयुक्त होता है , जबकि ‘ ज ‘ एक सामान्य तालव्य व्यंजन है । इसके उच्चारण में वायु सामान्य रूप से तालु से स्पर्श करती वायु है । नीचे के उदाहरणों को देखें :

जहाज उजला नज़र रोज़ ज जलावन जलपान जवान जानकार जीवन उज्ज्वल ज रोज़गार बाजार इज्जत जुर्रत चीज़ ज़िन्दगी

12. ‘ त ‘ का प्रयोग :

सामान्यतया ‘ तत् ‘ , ‘ महत् ‘ और ‘ सत् ‘ में ‘ त्व ‘ प्रत्यय जुड़ने पर ‘ त ‘ का प्रयोग होता है । सच्चाई यह है कि तत् , महत् और सत् में पूर्व से ही ‘ त् ‘ है जो ‘ त्व ‘ से जुड़कर ( ‘ त ‘ का ) द्वित्व हो जाता है । जैसे –

तत् + त्व = तत्त्व महत् + त्व = महत्त्व सत् + त्व = सत्त्व

उत्तरावस्था और उत्तमावस्था में ‘ तर ‘ एवं ‘ तम ‘ प्रत्यय जुड़ने के कारण भी ‘ त् ‘ अन्तवाले शब्द द्वित्व हो जाते हैं । जैसे –

महत् + तर = महत्तर ( उत्तरावस्था में )

महत् + तम = महत्तम ( उत्तमावस्था में )

ध्यातव्य : बहुत सारे छात्र खासकर गणित में ‘ महत्तम ‘ की तरह ही ‘ लघुत्तम ‘ का प्रयोग कर गलती कर बैठते हैं । शुद्ध रूप ‘ लघुतम ‘ होता है ।

13. ‘ इ ‘ एवं ‘ ई ‘ की मात्रा का प्रयोग :

किसी स्त्रीलिंग संज्ञा शब्द के अन्त में ‘ ई ‘ रहने पर उसके बहुवचन रूप बनाने में ‘ ई ‘ की जगह ‘ इ ‘ की मात्रा का प्रयोग होता है । जैसे –

लड़कीलड़कियाँ
खिड़कीखिड़कियाँ
स्त्रीस्त्रियों
जालीजालियाँ
शादीशादियाँ
गाड़ीगाड़ियाँ
नदीनदियाँ

अकारान्त या आकारान्त पुंल्लिंग संज्ञा के स्त्रीलिंग रूप में ‘ ई ‘ की जगह मात्रा लगाई जाती है । जैसे –

देवदेवी
लड़कालड़की
घोड़ाघोड़ी
बाछाबाछी

अन्त में ‘ इत ‘ का उच्चारण होने पर ‘ इ ‘ की मात्रा लगाई जाती हैं । जैसे –

फलितकथित
चित्रितपरिवर्तित
पुष्पितलिखित
चिह्नितजनहित

ईला / ईय का उच्चारण होने पर ‘ ई ‘ की मात्रा लगानी चाहिए । जैसे –

रंगीलागर्वीला
प्रांतीयराष्ट्रीय
जहरीलाजातीय
पुस्तकीयशर्मीला
नशीलाजलीय

‘ ई ‘ की अपेक्षा ‘ इ ‘ का उच्चारण हल्का होता है । क्योंकि ‘ इ ‘ ह्रस्व है और ‘ ई ‘ दीर्घ । ‘ इ ‘ की मात्रा का उच्चारण करने से पूर्व के वर्ण पर जोर देकर ‘ इ ‘ को झटके से बोलना चाहिए । निम्नलिखित शब्दों का इसी तरह उच्चारण करें –

गतिनीतितिथिमुनिअतिथिपुष्टिहानि
शनिशान्तिकालिदासमतिआजीविकास्थितिबुद्धि
जीविकाकोटिमाचिसतिरस्कारतिलांजलिगृहिणीरचयिता
आशीर्वादपीताम्बरश्रीमतीकविकवयित्रीदैनंदिनीवर्तनी

‘ इक ‘ का उच्चारण ( अन्त में ) होने पर ‘ इ ‘ की मात्रा लगानी चाहिए । जैसे –

मासिकमानसिकसामाजिकआध्यात्मिकशारीरिकऐतिहासिक
स्वर्गिकसाप्ताहिकलौकिकभौतिकपारलौकिकरासायनिक
वैवाहिकऐहलौकिकनैसर्गिकभौगोलिकप्राकृतिकसार्वदेशिक

14. ‘ उ ‘ और ‘ ऊ ‘ का प्रयोग :

ऊकारान्त स्त्रीलिंग संज्ञा के बहुवचन रूप बनाने में ‘ ऊ ‘ की जगह ‘ उ ‘ की मात्रा लगाई जाती है । जैसे –

बहू – बहुएँ
वधू -वधुएँ

‘ र ‘ के साथ ‘ उ ‘ की मात्रा लगाने पर ‘ रु ‘ और ‘ ऊ ‘ की मात्रा लगाने पर ‘ रू ‘ , ऐसा रूप बन जाता है । जैसे-

गुरु , पुरुष , रूद्र , रुपया , पुरुषोत्तम , जरूरत , रूठ , स्वरूप , जरूरी , रूई ‘ उ ‘ का उच्चारण झटके से और उसके पहले के वर्ण पर जोर देकर करना चाहिए । नीचे लिखे शब्दों को बोल – बोलकर लिखने का अभ्यास करें –

अनूदितऊधमउत्थानकुआँतूफानदुबारादूसरा
चाकूनीबूआलूभालूतम्बाकूबाबूबबुआ
झाडूखुशबूलहूबदबूलटटूजादूबिच्छू
कुसुमसुमनभिक्षुकसिंदूरउम्रचतुराईसूई

15. ‘ रेफ ‘ ( ) का प्रयोग :

रेफ ‘ , ‘ र ‘ , का ही रूप है । जिस वर्ण के बाद ‘ र ‘ का झटके से उच्चारण हो , ठीक उस वर्ण के बादवाले वर्ण पर ‘ रेफ ‘ का प्रयोग होता है । जैसे –

गर्म शर्म धर्म मर्म परिवर्तन निर्झर निरर्थक नर्तन कर्तव्य तर्क मर्मर सार्थक समर्थन चर्चा कर्ज़ वर्ष वर्षा गर्जन बर्मा धैर्य वार्षिक महर्षि सप्तर्षि समावर्तन उत्तीर्ण अनुत्तीर्ण दर्पण वर्णन कीर्तन समर्पण

16. योजक चिह्न ( – ) का प्रयोग :

योजक चिह्न ( हायफन ) का प्रयोग निम्नलिखित स्थानों पर होता है-

  • ( a ) द्वन्द्व समास के समस्तपदों और सहचर पदों के बीच : जैसे — माता – पिता अंधा काना राजा – रंक लूला – लँगड़ा अमीर गरीब इधर – उधर
  • ( b ) यदि दो पदों के बीच किसी कारक चिह्न की उपस्थिति का पता चले तो दोनों के बीच जैसे पेड़ – पौधे पर्यावरण – संरक्षक हैं । ( का / के चिहन की उपस्थिति ) गृह प्रवेश की तिथि नजदीक है । ( ‘ में चिह्न की उपस्थिति )
  • ( c ) यदि पूर्ण द्विरुक्त के बीच परसर्ग / निपात रहे तो उस परसर्ग / निपात के दोनों ओर : जैसे — बसही बाँध के टूटने से सर्वत्र पानी ही पानी दिखाई पड़ रहा था कारण , गाँव का – गाँव जलमग्न हो चुका था ।
  • ( d ) सादृश्यता / तुलना के लिए सा / से / सी / जैसा / जैसे / जैसी के पहले : जैसे – चाँद सा चेहरा तुम – सा कोई उनके – जैसा भाई

17 , परसर्ग / कारक चिह्न का प्रयोग : बच्चे प्रायः कारक चिहनों ( परसर्ग ) के प्रयोग में गलती कर बैठते हैं ; जैसे –

मोहन को पर्वतपर चढ़ना नहीं आता ।

मैं ने गलती नहीं की थी ।

उनमेंसे कोई नहीं था ।

ऊपर के तीनों वाक्य गलत हैं । हमें इस बात की सावधानी रखनी चाहिए कि परसर्ग , संशी से अलग लिखा जाता है ; सर्वनाम के साथ जुड़ा रहता है , किन्तु लगातार दो परसर्ग रहें तो पहला सर्वनाम से जुड़ा रहेगा और दूसरा उससे अलग ; अतः , इस आधार पर उक्त तीनों वाक्य होंगे :

  • ( i ) मोहन को पर्वत पर चढ़ना नहीं आता । ( संज्ञाओं से अलग )
  • ( ii ) मैंने गलती नहीं की थी ।( सर्वनाम से जुड़ा )
  • ( iii ) उनमें से कोई नहीं था ।( में जुड़ा और से अलग )

18. हलन्त का प्रयोग :

  • मान् / वान् / हान् प्रत्ययान्त शब्दों में हलन्त का प्रयोग अवश्य होना चाहिए । जैसे श्रीमान् , आयुष्मान , महान् , विद्वान् आदि ।
  • प्रथम , पंचम , षष्ठम , सप्तम , अष्टम , नवम और दशम में हलन्त का प्रयोग नहीं होता ।
  • त् / अम् / उत् प्रत्ययान्त तत्सम शब्दों में हलन्त का प्रयोग किया जाता है । जैसे स्वागतम् , विद्युत् , जगत् , परिषद् पश्चात् , शरद , सम्राट् आदि । –
  • व्यंजनों के संयुक्त रूप में हलन्त के प्रयोग से ज्यादा स्पष्टता आती है । जैसे विद्या , शुद्ध , कुत्ता , प्रसिद्ध , ज्योत्स्ना , उज्ज्वल आदि ।

ध्यातव्य : उपर्युक्त शब्दों का प्रचलन इस रूप में भी है विद्या , शुद्ध , कुत्ता , प्रसिद्ध , ज्योत्स्ना , उज्ज्वल ।

19. वाला / वाली / वाले कर आदि प्रत्वयों का प्रयोग :

उपर्युक्त प्रत्ययों के प्रयोग में बड़े बड़े लोग भी गलतियों कर बैठते हैं । इन प्रत्ययों में से वाला / वाली / वाले का प्रयोग विशेषण बनाने के लिए और ‘ कर ‘ का प्रयोग पूर्वकालिक क्रिया या क्रियाविशेषण बनाने के लिए होता है ।

प्रत्यय कभी शब्दों से अलग नहीं लिखे जाते ।

जैसे – दूधवाला आया है । फलवाले ने अजीव आवाज़ निकाली ।

वह खाकर चला गया है । श्यामू बैठकर खाता है ।

20 , ‘ कि एवं ‘ की ‘ का प्रयोग

> ‘ कि ‘ योजक का काम करता है अर्थात् दो वाक्यों को जोड़ता है । जैसे माना कि वस्तु का क्रयमूल्य 100 रु ० है । इसमें ‘ माना ‘ यानी हमने / मैंने माना और वस्तु का क्रयमूल्य 100 रु ० है , इन दोनों वाक्यों को ‘ कि ‘ जोड़ने का काम कर रहा है ।

इसी तरह , उसने कहा था कि इस साल भी गरमी काफी होगी ।

> यदि वाक्य में इसलिए ‘ का प्रयोग हो तो ‘ क्योंकि ‘ का प्रयोग न कर ‘ कि ‘ का प्रयोग ही करना चाहिए । जैसे-

‘ जल ‘ यौगिक इसलिए है कि इसमें हाइड्रोजन के दो और ऑक्सीजन का एक परमाणु है । ऐसा इसलिए कहा जाता है कि वह अपना विश्वास खो चुका है ।

‘ की ‘ का प्रयोग दो रूपों में होता है

1. दो पदों के बीच संबंध दर्शाने में :

जैसे – राजू की गाय बहुत दूध देती है ।

गोपी की माँ सबको प्यार करती है ।

सोनू की बहन पढ़ने में काफी तेज है ।

2. ‘ करना ‘ क्रिया के भूतकालिक रूप में प्रयोग :

जैसे — मैंने लड़ाई नहीं की ।

उसने अच्छी पढ़ाई की थी ।

21. संधि – संबंधी भूलें

अशुद्धशुद्घ
अनाधिकारअनधिकार ( अन् + अधिकार )
यावतजीवनयावज्जीवन ( यावत् + जीवन )
जगतगुरुजगद्गुरु ( जगत् + गुरु)
जगरनाथजगन्नाथ ( जगत् + नाथ )
तदोपरान्ततदुपरान्त ( तद् + उपरान्त )

घ्यातव्य : संधिपद का संधि विच्छेद करके देख लेना चाहिए कि उनके नियमों का उल्लंघन तो नहीं हुआ है ।

कुछ अन्य शब्द जिसमें गलतियाँ होती हैं:

अशुद्धशुद्घ
छत्रछायाछत्रच्छाया
अधस्पतनअधः पतन
पुरष्कारपुरष्कार
सत्गुणसद्गुण
सन्मुखसन्मुख

22. प्रत्यय संबंधी भूलें :

एक ही अर्थवाले दो प्रत्यय लगाना –

  • अज्ञानता – अज्ञान
  • उत्कर्षता – उत्कर्ष
  • औदार्यता औदार्य / उदारता
  • गौरवता – गौरव / गुरुता
  • धैर्यता – धीरता / धैर्य
  • बाहुल्यता – बहुलता / बाहुल्य
  • साम्यता साम्य / समता

> विशेषण से भाववाचक संज्ञा बनाने में :

  • उपयोगता – उपयोगिता
  • महानता – महत्ता
  • स्वतत्रा – स्वतंत्रता

>विशेषण बनाने में :

  • अक्षुण्ण – अक्षुण्ण
  • दुस्साध – दुःसाध्य / दुस्साध्य
  • सिंचित – सिक्त
  • प्रफुल्लित – प्रफुल्ल
  • दरिद्री – दरिद्र
  • पूज्यनीय – पूजनीय
  • मान्यनीय – माननीय / मान्य
  • नीतिवान् – नीतिमान्

> ये दोनों प्रचलित हैं और सही भी :

  • दुकान – दूकान
  • अंग्रेजी – अँगरेजी
  • अंजलि – अंजली
  • अनुमित – अनुमानित
  • उषा – ऊषा
  • क्रुद्ध – क्रोधित
  • सरदी – सर्दी
  • वरदी – वर्दी
  • भुजग – भुजग
  • पाउड – पौड
  • हलुआ – हलवा

23. शिरोरेखा संबंधी भूलें :

शिरोरेखा लगाने में जल्दबाजी करने पर अर्थ का अनर्थ हो सकता है , किन्तु बड़े – बड़े साहित्यकार जान – बूझकर रोचकता लाने के लिए ऐसा करते देखे गए हैं । नीचे लिखे उदाहरणों को देखें और भावार्थ का पता करें :

वहाँ भी जीवन था । वहाँ भी जीव न था ।

मनन करना अच्छी बात है । मन न करना अच्छी बात है ।

सूर और तुलसी एककालीन थे । सूर और तुलसी एक कालीन थे ।

यह गागर खाली है । यह गागर खा ली है ।

उस गदहे पर लादो । उस गदहे पर ला दो ।

सावन के बादलो ! झूम – झूमकर बरसो । सावन के बाद लो झूम – झूमकर बरसो ।

उसकी पीली पत्तियाँ झड़ने लगीं । उसकी पी ली पत्तियाँ……………

गुजरात में द्वारका है । गुजरात में द्वार का है ।

करका मनका छाँड़ि दे , मन का मनका फेर । ( कबीरदास )

24. संयुक्त व्यंजन की भूलें :

( क ) ( ‘ य ‘ के साथ )
अशुद्धशुद्ध
अन्तानअन्तर्धान
उपलक्षउपलक्ष्य
अन्ताक्षरीअन्त्याक्षरी
कियारीक्यारी
जादाज्यादा
कियोंक्यों
( ख ) ‘ र ‘ के साथ
आर्दशआर्दश
असर्मथअसर्मथ
प्राथर्नाप्राथर्ना
आर्शीवादआर्शीवाद
आर्चायआर्चाय
कार्यक्रमकार्यक्रम

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