भाषा किसे कहते है ?




हम सभी अपने मन की बात प्रकाश करने के लिए भाषा का प्रयोग हैं। लेकिन आप जानते हैं भाषा किसे कहते है ? तो आज हम आपको भाषा के बारे मैं जानकारी देने बाले हैं। जिससे आपको भाषा किया हैं पता चलेगा। भाषा हमारे जन्म से मृत्यु तक हमारे साथ ही चलता हैं। तो आइये जानते हैं “भाषा किसे कहते है ?”

भाषा :

” भाषा वह साधन है , जिसके माध्यम से मनुष्य बोलकर , लिखकर या संकेत कर परस्पर अपना विचार सरलता , स्पष्टता , निश्चितता तथा पूर्णता के साथ प्रकट करता है । ” यह किसी एक व्यक्ति की सम्पत्ति नहीं है ; समाज की उपज है । यह शब्दों से तो बनती है ; पर उसी पर खत्म नहीं होती है । शब्दों के अर्थ और कहीं नहीं , हमारे अपने ही मन में होते हैं । हम अपने सामाजिक क्षेत्र में कुछ विचारों , कार्यो , वस्तुओं आदि का संबंध कुछ विशिष्ट शब्दों या ध्वनियों से स्थापित कर लेते हैं । यही करण है कि कोई बात सुनकर या पढ़कर उसका अर्थ ( भाव ) हम इसीलिए समझ लेते हैं कि हम जानते हैं कि वक्ता या लेखक अपने इन शब्दों से वही आशय प्रकट कर रहा है , जो आशय आवश्यकता पड़ने पर स्वयं हम अथवा हमारे समाज के अन्य लोग इनसे प्रकट करते आए हैं ।

यों तो भाषा को हम दो रूपों में ही स्पष्टतया व्यक्त करते हैं — लिखकर अथवा बोलकर ; परन्तु सांकेतिक भाषा का भी अपना महत्त्व हुआ करता है । यह सांकेतिक रूप कई रूपों में हमारे सामने आता है । उदाहरणस्वरूप-

( क ) विभिन्न रंगों से संकेत कर : 

ट्रैफिक चौराहों पर लाल और हरे रंगों द्वारा खास – खास बातें कही जाती हैं । लाल रंग ठहरने का और हरा रंग आगे बढ़ने की तरफ इशारा करता है । अस्पतालों में भी रंगों का प्रयोग देखने को मिलता है । इसी तरह विभिन्न अधिकारियों की गाड़ियों में भी रंगीन बल्बों द्वारा खास तरह की सांकेतिक भाषा का प्रयोग किया जाता है ।

( ख ) ध्वनि – संकेत :

 भारी लट्ठों या वजनी सामानों को उठाने या धकेलने में ध्वनि – संकेत दिखता है । सायरन की आवाज़ , भोंपू की आवाज़ , स्कूलों में घंटी की आवाज , अग्निशामक यंत्रों की आवाज़ ; इसी तरह मवेशियों या पक्षियों को कुछ कहने या समझाने के लिए हम ध्वनि संकतों का प्रयोग करते हैं । यह ध्वनि – संकेत शब्दों या वाक्यों में दर्शाए नहीं जा सकते ; परन्तु इनका महत्त्व तो होता ही है ।

( ग ) आंगिक संकेत : 

विभिन्न अवसरों पर हम अपने विभिन्न अंगों जैसे मुख , नाक , आँख , हाथ , ओठ , गर्दन , उँगली आदि द्वारा अपने मन के भाव को व्यक्त करते हैं या अभिव्यक्ति से अवगत होते हैं । इन आंगिक संकेतों के कारण ही भाषा में अंगों से संबंधित मुहावरों का प्रयोग दिखता है ।

हाँ , यह सच है कि एक ही संकेत विभिन्न अवसरों पर भिन्न भिन्न भावों को व्यक्त करते हैं , परन्तु इतना भर से इस माध्यम को महत्त्वहीन मान लेना बुद्धिमत्ता नहीं । अगर इस आधार पर सांकेतिक भाषा को खारिज कर दिया जाय तो फिर गूंगों और बहरों के लिए किस माध्यम का प्रयोग होगा ?

दूसरा तर्क यह भी है कि क्या लिखित या मौखिक कोई शब्द ही भिन्न – भिन्न स्थानों पर भिन्नार्थ प्रकट नहीं करता ? एक उदाहरण लेते हैं -:

‘ काटना ‘ के विभिन्न प्रयोग

  • ( a ) जंगल काटे जा रहे हैं ।
  • ( b ) साँप ने काट खाया है ।
  • ( c ) उसका वेतन काट लिया गया ।
  • ( d ) उसने दाँत काट लिया ।
  • (e ) बिल्ली रास्ता काट गई ।
  • (f) उसकी ऐसी स्थिति हो गई कि काटो तो खून नहीं
  • (g ) वह बात काटकर चला गया ।
  • ( h ) उससे तो समय काटते नहीं कटता ।
  • ( i ) वह बच्चा बड़े बड़ों के कान काटता है ।

ऊपर के प्रयोगों से स्पष्ट है कि शब्दों के भिन्न – भिन्न अर्थ होते हैं जो परिस्थिति एवं प्रयोग पर निर्भर करते हैं । संस्कृत के विद्वानों ने स्पष्ट रूप से स्वीकारा है- ” शब्दानाम् अनेकार्थः ।

यही तो स्थिति है सांकेतिक भाषा की भी ; फिर इसे भाषा व्यक्त करने का तरीका न मानना भूल ही है । हाँ , यह सत्य है कि भाषा के लिखित और मौखिक रूपों का ज्यादा प्रयोग हो रहा है ।

भाषा व्यक्त करने के चाहे जो भी तरीके हों , हम किसी न किसी शब्द , शब्द – समूहों या भावों की ओर ही इशारा करते हैं जिनसे सामनेवाला अवगत होता है । इसलिए भाषा में हम केवल सार्थक शब्दों की बातें करते हैं । इन शब्दों या शब्द समूहों वाक्यों ) द्वारा हम अपनी आवश्यकताएँ , इच्छाएँ , प्रसन्नता या खिन्नता , प्रेम या घृणा , क्रोध अथवा संतोष प्रकट करते हैं । हम शब्दों का प्रयोग कर बड़े – बड़े काम कर जाते हैं या मूर्खतापूर्ण प्रयोग कर बने – बनाए काम को बिगाड़ बैठते हैं । हम इसके प्रयोग कर किसी क्रोधी के क्रोध का शमन कर जाते हैं तो किसी शांत – गंभीर व्यक्ति को उत्तेजित कर बैठते हैं । किसी को प्रोत्साहित तो किसी को हतोत्साहित भी हम शब्द प्रयोग से ही करते हैं । कहने का यह तात्पर्य है भाषा के द्वारा बहुत सारे कार्यों को करते हैं । हमारी सफलता या असफलता ( अभिव्यक्ति के अर्थ में ) हमारी भाषायी क्षमता पर निर्भर करती है ।

भाषा से हमारी योग्यता अयोग्यता सिद्ध होती है । जहाँ अच्छी और सुललित भाषा हमें सम्मान दिलाती है वहीं अशुद्ध और फूहड़ भाषा हमें अपमानित कर जाती है ( समाज में ) । स्पष्ट है कि भाषा ही मनुष्य की वास्तविक योग्यता , विद्वत्ता और बुद्धिमत्ता , उसके अनुशीलन , मनन और विचारों की गंभीरता उसके गूढ उद्देश्य तथा उसके स्वभाव , सामाजिक स्थिति का परिचय देती है ।

‘ कोई अपमानित होना नहीं चाहता । अतएव , हमें सदैव सुन्दर और प्रभावकारिणी भाषा का प्रयोग करना चाहिए । इसके लिए यह आवश्यक है कि हमारा प्रयल निरंतर जारी रहे । भाषा में पैठ एवं अच्छी जानकारी के लिए हमें निम्नलिखित बातों पर हमेशा ध्यान देना चाहिए -:

( क ) हम छोटी छोटी भूलों पर सूक्ष्म दृष्टि रखें और उसे दूर करने के लिए प्रयत्नशील रहे । चाहे जहाँ कहीं भी हों अपनी भाषायी सीमा का विस्तार करें । दूसरों की भाषा पर भी ध्यान दें ।

( ख ) खासकर बच्चों की भाषा पर विशेष ध्यान दें । यदि हम उनकी भाषा को शुरू से ही व्यवस्थित रूप देने में सफल होते हैं तो निश्चित रूप से उसका ( भाषा का वातावरण तैयार होगा ।

( ग ) सदा अच्छी व ज्ञानवर्धक पुस्तकों का अध्ययन करें । उन पुस्तकों में लिखे नये शब्दों के । अर्थों एवं प्रयोगों को सीखें । लिखने एवं बोलने की शैली सीखें ।

( घ ) वाक्य – प्रयोग करते समय इस छोटी सी बात का हमेशा ध्यान रखें हर संज्ञा के लिए एक उपयुक्त विशेषण एवं प्रत्येक क्रिया के लिए सटीक क्रिया – विशेषण का प्रयोग हो ।

( ड ) विराम – चिह्नों का प्रयोग उपयुक्त जगहों पर हो । लिखते और बोलते समय भी इस बात का ध्यान रहे ।

( च ) मुहावरे , लोकोक्तियों , बिम्बों आदि का प्रयोग करना सीखें और आस – पास के लोगों को सिखाएँ ।

( छ ) जिस भाषा में हम अधिक जानकारी बढ़ाना चाहते हैं , हमें उसके व्यावहारिक व्याकरण का ज्ञान होना आवश्यक है ।

हमें सदैव इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि भाषा परिवर्तनशील होती है । किसी भाषा में नित नये शब्दों , वाक्यों का आगमन होते रहता है और पुराने शब्द टूटते , मिटते रहते हैं । किसी शब्द या वाक्य को पकड़े रहना कि यह ऐसा ही प्रयोग होता आया है और आगे भी ऐसा ही रहेगा या यही रहेगा — कहना भूल है । आज विश्व में कुल 2,796 भाषाएँ और 400 लिपियाँ मान्यता प्राप्त हैं । एक ही साथ इतनी भाषाएँ और लिपियाँ नहीं आईं । इनका जन्म विकास के क्रम में हुआ , टूटने – फूटने से हुआ ।

किसी भाषा के दो मुख्य आधार हुआ करते हैं-:

( i ) मानसिक आधार ( Psychical Aspect ) और

( ii ) भौतिक आधार ( Physical Aspect )

मानसिक आधार से आशय है , वे विचार या भाव , जिनकी अभिव्यक्ति के लिए वक्ता भाषा का प्रयोग करता है और भौतिक आधार के जरिए श्रोता ग्रहण करता है । इसके सहारे भाषा में प्रयुक्त ध्वनियाँ ( वर्ण , अनुतान , स्वराघात आदि ) और इनसे निकलनेवाले विचारों या भावों को ग्रहण किया जाता है । जैसे- ‘ फूल ‘ शब्द का प्रयोग करनेवाला भी इसके अर्थ से अवगत होगा और जिसके सामने प्रयोग किया जा रहा ( सुननेवाला ) वह भी । यानी भौतिक आधार अभिव्यक्ति का साधन है और मानसिक आधार साध्य । दोनों के मिलने से ही भाषा का निर्माण होता है । इन्हें ही ‘ बाह्य भाषा ‘ ( Outer Speech ) और आन्तरिक भाषा ( Inner Speech ) कहा जाता है । पहले ही कहा गया है कि भाषा समाज – द्वारा अर्जित सम्पत्ति है और उसका अर्जन मानव अनुकरण के सहारे समाज से करता है । यह अनुकरण यदि ठीक ठाक हो तो मानव किसी शब्द को ठीक उसी प्रकार उच्चरित करेगा , परन्तु ऐसा होता नहीं है । वाक्य , अर्थ आदि का अनुकरण मानसिक रूप में समझकर किया जाता हैं । अनुकरण करने में प्रायः अनुकर्ता कुछ भाषिक तथ्यों को छोड़ देता है और कुछ को जोड़ लेता है । जब एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी , भाषा का अनुकरण कर रही होती है , तब ध्वनि , शब्द , रूप , वाक्य , अर्थ- भाषा के पाँचों क्षेत्रों में इसे छोड़ने और जोड़ने के कारण परिवर्तन बड़ी तेजी से होता है ।

Leave a Reply