ध्यानि किसे कहते हैं ?




आप सभी जानते हैं मन की बात प्रकाश करने के लिए भाषा का प्रयोग होता हैं । लेकिन एक भाषा को अच्छी तरह से बोलने के लिए हमे ध्यानि का प्रोयग करना परता हैं। तो आप जानते हैं ध्यानि किसे कहते हैं ? तो आज हम आपको ध्यानि के बारे मैं जानकारी देने बाले हैं। जिससे आपको ध्यानि किया हैं पता चलेगा। तो आइये जानते हैं “ध्यानि किसे कहते है ?”

ध्यानि :

‘ ध्यानि ‘ का अर्थ है – वर्ण या भाषा की लघुतम इकाई । इसका खंड या टुकड़ा नहीं हो सकता । अर्थात् ” वर्ण वह मूल ध्वनि है , जिसका खंड नहीं होता । ”

वर्णों या व्यनियों के क्रमबद्ध समूह को ‘ वर्णमाला ‘ कहते हैं । हिन्दी वर्णमाला में कुल 46 वर्ण है-:

1. स्वर वर्ण (11)

अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ और औ ।

स्वर वर्णों का उच्चरण बिना रुके लगातार होता है । ऊपर के किसी वर्ण का उच्चारण लगातार किया जा सकता है सिर्फ ‘ क ‘ वर्ण को छोड़कर , क्योंकि ऋ का लगातार उच्चारण करने पर स्वर आ जाता है ।

  • आ 55555 5555555 ( अंत तक ‘ आ ‘ ध्वनि )
  • ई 555555555555555 ( अंत तक ईवनि )
  • ऊ 555555555555555 ( अंत तक ऊ ‘ ध्वनि )

उच्चारण में लगनेवाले समय के आधार पर स्वर वर्णों को दो भागों में बाँटा गया है .

  • ( a ) मूल या हस्व स्वर – अ , इ , उ और ऋ
  • ( b ) दीर्घ स्वर – आ , ई , ऊ , ए , ऐ , ओ , और औ

व्यातव्य :

ए , ऐ , ओ और औ को संयुक्त या संध्य स्वर कहा जाता है , क्योंकि ये दो भिन्न स्वरों के संयोग या संधि के कारण बने हैं । नीचे देखें :-

  • ए : आ / आ + इ ई ( गुण होने के कारण )
  • ओ : अ / आ + उ / ऊ ( गुण होने के कारण )
  • ऐ : अ / आ + ए ( वृद्धि होने के कारण )
  • औ : अ / आ + ओ ( वृद्धि होने के कारण )

जाति के अनुसार स्वर वर्णों को दो भागों में रखा गया है –

( a ) सजातीय / सवर्ण स्वर : इसमें सिर्फ मात्रा का अंतर होता है । ये हस्व और दीर्घ के जोड़ेवाले होते हैं । जैसे –

अ – आ इ – ई उ – ऊ

( b ) विजातीया असवर्ण स्वर ये दो भिन्न उच्चारण स्थानवाले होते हैं । जैसे –

अ – इ उ – ओ आदि ।

स्वरों के प्रतिनिधि रूप , जिनसे व्यंजन वर्णों का उच्चारण हो पाता है ‘ मात्रा ‘ कहते हैं ।

स्वरशुद्ध व्यंजनसस्वर व्यंजनमात्रा
  क्x
  क्का ा
  क्किि
  क्की
क्कु
  क्कूू,
  क्कृ
  क्के
  क्कै
  क्को
  क्कौ

2. व्यंजन वर्ण ( 33 ) :

व्यंजन वर्णों का उच्चारण रुक – रुक कर होता है । ये वर्ण आधी मात्रावाले होते हैं , इसलिए बिना स्वर के इनका उच्चारण असंभव है ।

व्यंजन वर्णों को तीन भागों के बाँटा गया है :-

( क ) स्पर्श व्यंजन :

ये वर्ण विभिन्न वागिन्द्रियों ( कंठ , तालु , मूर्धा , दन्त , ओष्ठ आदि ) से स्पर्श के कारण उच्चरित होते हैं । इसके अंतर्गत निम्नलिखित वर्ण आते हैं –

  • कवर्ग :  क , ख , ग , घ , डं
  • चवर्ग : च , छ , ज , झ , ञ
  • टवर्ग : ट् , ठ , इ , थ् , द् , न् ( ड़ , ढ़ )
  • तवर्ग : त , थ , द , ध , न
  • पवर्ग : प , फ , ब , भ , म

ध्यातव्य : ढ़ और ड़ – ये दोनों वर्ण ढ और ढ से विकास करके बने हैं । इनका प्रयोग शब्दारंभ में नहीं होता । ये मध्य या अन्त में आते हैं । जैसे –

मेढ़क , पढ़ना , चढ़ना , गढ़ आदि लड़का , सड़क , कड़क , कड़ा आदि

बिना बिन्दुवाले का प्रयोग शुरुआत में होता है । जैसे — ढोलक , डमरू आदि ।

( ख ) अन्तःस्थ व्यंजन :

ये वर्ण स्पर्श एवं ऊष्म के बीच आते हैं । इसके अंतर्गत य , र , ल् और व् – ये चार ध्वनियाँ आती हैं ।

( ग ) ऊष्म व्यंजन :

ये ऐसे वर्ण हैं , जिनके उच्चारण में विशेष घर्षण के कारण मुख से गर्म हवा निकलती है । इसके अंतर्गत श , ष , स् और ह् आते हैं ।

( iii ) अयोगवाह वर्ण : ‘ अनुस्वार ‘ और ‘ विसर्ग ‘ अयोगवाह वर्ण हैं । ये स्वर एवं व्यंजन दोनों द्वारा ढोए जाते हैं । जैसे

अं अः ( स्वर द्वारा ) कं – कः ( व्यंजन द्वारा )

उच्चारण में वायु प्रक्षेप की दृष्टि से या काकल के आधार पर वर्णों के दो प्रकार हैं ।

( क ) अल्पप्राण : ऐसे वर्ण , जिनके उच्चारण में वायु की सामान्य मात्रा रहती है और हकार 1 जैसी ध्वनि बहुत ही कम होती है । इसके अंतर्गत सभी स्वर वर्ण , वर्गों के प्रथम , तृतीय और पंचम वर्ण , अनुस्वार और अन्तःस्थ व्यंजन आते हैं । इसकी कुल संख्या 11 + 15 + 1 +4 = 31 हैं ।

( ख ) महाप्राण : महाप्राण ध्वनियों के उच्चारण में वायु की पर्याप्त मात्रा होती है , जिसके कारण हकार – जैसी ध्वनि स्पष्ट दिखती है । इसके अंतर्गत सभी वर्गों के द्वितीय और चतुर्थ व्यंजन , विसर्ग और ऊष्म व्यंजन आते हैं । इसकी कुल संख्या 10 + 1 + 4 = 15 हैं ।

ध्यातव्य : स्पर्श व्यंजन वर्णों को ही ‘ वर्गीय व्यंजन ‘ कहा जाता है । आपने ऊपर देखा है कि स्पर्श व्यंजन वर्णों को कवर्ग , चवर्ग , टवर्ग , तवर्ग और पवर्ग इन पाँच विभागों में बाँटा गया है ।

स्वर – तंत्री के आधार पर वर्णो को दो अन्य भागों में भी बाँटा गया है ।

( क ) चोष या सघोष वर्ण : धोष ध्वनियों के उच्चारण में स्वर तंत्रियों आपस में मिल जाती हैं और वायु धक्का देते बाहर निकलती है । फलत ; झंकृति पैदा होती है । इसके अंतर्गत सम स्वर वर्गों के तृतीय , चतुर्थ और पंचम वर्ण , अन्तःस्थ और ह आते हैं ।

( ख ) अघोष वर्ण : अघोष वर्गों के उच्चारण में स्वर तंत्रियाँ परस्पर नहीं मिलती । फलतः वायु , आसानी से निकल जाती है । इस वर्ग में वर्गों के प्रथम और द्वितीय वर्ण और तीनों से ( श , ष , स ) आते हैं ।

ध्वनियों के उच्चारण में स्वर – तंत्री , काकल , मुख – विवर , तालु , मसूढ़ा , दाँत , ओष्ट आदि को जो प्रयास करना पड़ता है , उसे व्याकरण की भाषा में ‘ प्रयल ‘ कहा जाता है । ये प्रयत्न दो प्रकार के होते हैं-

  • ( i ) आभ्यन्तर और
  • ( ii ) बाह्य

किसी भाव को व्यक्त करने में ध्वनियों के कम्पन में उतार – चढ़ाव को ही ‘ अनुतान ‘ कहा जाता है । संगीतशास्त्र में इसका बड़ा महत्त्व होता है । इसके कारण भावों में भारी अन्तर आ जाता है । हर्ष , शोक , आश्चर्य , घृणा , तिरस्कार आदि भावों को व्यक्त करने में अनुतान की आवश्यकता पड़ती है । अनुतान के कारण भाषा में रोचकता आती है । यही कारण है कि औरतों और बच्चों की बोलियों में काफी मधुरता देखी जाती है ।

प्रत्येक वाक्य एक निश्चित लय में ही व्यवहूत होता है । वाक्यों की लय स्वर की ऊँचाई पर निर्भर करती है । सामान्य कथनों में स्वर ऊँचाई से नीचे तक जाता है , परन्तु प्रश्नवाचक जैसे वाक्यों में ठीक इसके विपरीत होता है । नीचे के उदाहरणों को देखें कि अनुतान के कारण एक ही वाक्य भिन्नार्थ को कैसे व्यक्त करता है –

पेड़ – पौधे लगाकर पर्यावरण को बचाया जा सकता है । पेड़ – पौधे लगाकर पर्यावरण को बचाया जा सकता है ? पेड़ – पौधे लगाकर पर्यावरण को बचाया जा सकता है । पेड़ – पौधे लगाकर ! पर्यावरण को बचाया जा सकता है ।

उच्चारण के समय जब स्वरों पर अधिक बल पड़ता है तब उसे बलाघात या स्वराघात कहा जाता है ।

यह तीन तरह का होता है –

1. वर्ण बलाघात : इससे अर्थ में अन्तर आ जाता है । जैसे — पिट – पीट , लुट – लूट इन उदाहरणों में स्पष्ट देखा जा रहा है कि ‘ पि ‘ और ‘ लु ‘ पर बलाघात के कारण अर्थों में अंतर आ गया है ।

2. शब्द – बलाघात इससे वाक्यों के अर्थों में स्पष्टता आती है । ध्यातव्य : वाक्यों में एक साथ लगातार दो स्वराघातों का प्रयोग नहीं करना चाहिए । ‘ बावजूद ‘ , ‘ कहीं , कोई या कभी के बाद ‘ भी ‘ का प्रयोग वर्जित है ।

3. वाक्यन्धलाघात : इसमें वाक्य के भिन्न भिन्न पदों पर बलाघात के कारण भावों में अन्तर 1 . 4 . देखा जाता है । जैसे-

पिताजी ने प्रवर को आज दस रुपये दिए ।

रेखांकित पद पर बल देने से अर्थ निकला – पिताजी ने ही , अन्य नहीं । पिताजी ने प्रवर को आज दस रुपये दिए । ‘ आज ‘ पर बलाघात के कारण अर्थ हुआ – आज ही , अन्य दिन नहीं ।

निम्नलिखित स्थानों पर बलाघात देखा जाता है –

  1. संयुक्त व्यंजन के पूर्वाक्षर पर – पक्ष , दक्ष
  2. दीर्घ स्वर पर – सावी मोती
  3. संयोग के पूर्व का स्वर जहाँ तानकर बोलने में कठिनाई हो — विपत्ति – विपत , संपत्ति – संपद्
  4. इ , ऊ , के पूर्ववर्ती वर्ण का स्वर भी बोलने में तन जाता है । जैसे – कुरि , वस्तु , लघु आदि ध्यातव्य : हस्व की मात्रा का सही उच्चारण करने के लिए हस्व / उ की मात्रा से पहले के वर्ण पर बलाघात का प्रयोग करने से अशुद्धता भी कम होती है और स्पष्ट उच्चारण भी ।
  5. 5. विसर्ग वाले अक्षरों का उच्चारण झटके से होता है । जैसे- दुःख , निःसन्देह , प्रातःकाल आदि ।

प्रायः लोग वर्ण और अक्षर को समानार्थी मान लेने की भूल कर बैठते हैं । एक या अनेक ध्वनियों की उस छोटी से छोटी इकाई को ‘ अक्षर ‘ कहा जाता है , जिनका उच्चारण एक झटके में होता है । जैसे

  • आ – एक ध्वनिवाला अक्षर
  • खा – दो ध्वनियों वाला अक्षर
  • बैठ – तीन ध्वनियों वाला अक्षर एक अक्षर में व्यंजन अनेक जबकि स्वर प्रायः एक ही रहता है । जैसे –
  • आ , ओ : केवल स्वर अब ,
  • आव : स्वर + व्यंजन खा , पी व्यजन + स्वर क्या , क्यों : व्यंजन + व्यंजन + स्वर स्त्री व्यजन + व्यजन + व्यजन + स्वर स्वर + व्यंजन + व्यंजन + व्यंजन व्यंजन + व्यंजन + स्वर + व्यंजन + व्यंजन

अक्षर दो प्रकार के होते हैं –

  1. बद्घाक्षर जिसकी अंतिम ध्वनि हलंतयुक्त हो । जैसे – श्रीमान् , जगत , परिषद् आदि
  2. मुक्ताक्षर : जिसकी अंतिम ध्वनि स्वर हो । जैसे – खा , ला . पी , जा , जगत आदि

अब नीचे लिखे शब्दों और संयुक्ताक्षारों पर ध्यान दें –

  • पक्का , कुत्ता , बच्चा , खट्टा , प्रसन्न
  • चिह्न , विद्या , प्रसिद्ध , भट्ठा

आप देख रहे हैं , प्रथम वर्ग के सभी शब्दों में एक ही व्यंजन वर्ण स्वयं से संयोग करता है और दूसरे वर्ग में आप पाते हैं कि दो अलग अलग व्यंजनों का संयोग हुआ है ।

प्रथम वर्ग के सभी शब्द ‘ युक्ताक्षर द्वित्व ‘ या ‘ युग्मक ध्वनि ‘ के उदाहरण हैं और द्वितीय वर्ग के सभी शब्द ‘ व्यंजन गुच्छ ‘ के । यानी ,

जब कोई व्यंजन वर्ण स्वयं से ही संयोग करे , तो वह ‘ युग्मक ध्वनि ‘ और जब किसी अन्य व्यंजन वर्ण से संयोग करे तो वह ‘ व्यंजन गुच्छ ‘ कहलाता है ।

जब व्यंजन वर्णों को मूलरूप में और स्वरों की मात्राओं को भी मूल स्वरों ( मूल रूपों ) में व्यक्त किया जाता है तब इस क्रिया को ‘ वर्ण वियोजन ‘ कहा जाता है और जब बिखरे वर्णों को मिलाकर शब्द – निर्माण किया जाता है तब इस क्रिया को ‘ वर्ण – संयोजन ‘ कहते हैं । जैसे –

विद्या / विद्या – व् + इ + द् + य् + आ ( वर्ण – वियोजन )

वर्णों के उच्चारण स्थान के लिए इसे याद कर लें –

‘ अकह विसर्ग ‘ कण्ठराम । ‘ इचयश ‘ भी हैं तालु राम ।।

‘ ऋटष ‘ से जानो मूर्धा जी । ‘ लुतस ‘ पुकारो दन्त जी ।।

‘ उप ‘ आते हैं ओष्ठ में । केवल ‘ व ‘ दन्तोष्ठ में ।।

‘ ए – ऐ ‘ कहे कण्ठ – तालु । ‘ ओ – औ ‘ कहे कण्ठोष्ठ में ||

नासिका से पंचमाक्षर । जिह्वा रखो प्रकोष्ठ में ।।

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